वो तार

World Mental Health Day 2015

World Mental Health Day 2015

अन्वेष पिछले तीन दिन से आई सी यु में भर्ती था,  ज़िन्दगी और मौत के बीच झूलता हुआ। बिना झूले के बिस्तर पर पड़ा हुआ। वेंटीलेटर भी लगा था जिससे सांस आ जा रही थी।  या कहें धीरे धीरे जा रही थी।  पता नहीं ज़िन्दगी मौत के पीछे थी या मौत ज़िन्दगी के पीछे, पर हाँ एक रेस जरूर थी इन दोनों के बीच।

छत्तीस  साल का अन्वेष एक सॉफ्टवेयर कंपनी में रीजनल हेड की पोस्ट पर था।  तनख्वाह तो अच्छी खासी थी ही साथ ही कंपनी में उसकी रिस्पेक्ट भी काफी थी। उसने दिल्ली के अमीरों वाले इलाक़े वसंत विहार में फ्लैट खरीद रखा था। ये ऐसा इलाका था जहाँ फ्लैट किराये पर लेकर रहना अमीरियत की निशानी है तो खरीदना तो पता नहीं क्या होगी।  दो बड़ी सेडान सेगमेंट की गाड़ियां भी थीं। शिरीन से शादी को करीब दो साल हुए थे और एक बच्चा भी था।  सब कुछ अच्छा , ख़ुशहाल।  दिखने में कोई परेशानी नहीं।

पर फिर अचानक क्या हुआ की इस खुशहाल ज़िन्दगी से इस झूले पर!

उस रात पति पत्नी में भयंकर झगड़ा हुआ था। वैसे ये कुछ नया नहीं था अन्य पति पत्नियों की ही तरह।  पर आज कुछ ज़्यादा ही हो गया जब शिरीन ने उससे गुस्से में कहा “अब तुमने इस आफत को भी मेरे गले डाल दिया, नहीं तो मैं कब की तुम्हें छोड़कर चली गयी होती ”  .

ये सुनकर उसे बहुत दुःख हुआ था।  शिरीन और वो दोनों एक दूसरे को करीब सात साल से जानते थे।  फिर उन्होंने शादी की थी। शादी से पहले सब ठीक ठाक था। शादी से पहले शिरीन एक सीधी साधी पत्नी, जो घर सम्हाले और पति और बच्चे में अपना सुख देखे, की तरह तरह जीवन बिताना चाहती थी। इसीलिए उसने शादी होते ही नौकरी छोड़ दी, अन्वेष के लाख समझने पर भी की “अपनी उस मेहनत और समय के बारे में सोचो जो तुमने इतने साल इस पढाई पर लगाये।  और अब तुम अपना करियर ऐसे छोड़ रही हो।”

पर शादी के बाद धीरे धीरे शिरीन को लगने लगा की शायद वो इस तरह घर पर नहीं बैठ पायेगी।  और धीरे धीरे उसने इसके लिए अन्वेष को जिम्मेद्दार ठहरना शुरू किया। इंतहा तो तब हुयी जब बच्चा भी इसकी चपेट में आने लगा।  बस यही अन्वेष का दिमाग सम्हाल नहीं पाया और उस रात उसने शायद शराब ज़्यादा पि ली थी  और घर की छत  पर चला आया।

“हाँ यही तो हुआ था और फिर शायद मैं छत से गिर पड़ा। ” अन्वेष के दिमाग आई सी यु में लेटे लेटे कहा।  शायद मुझे गहरी चोट लगी थी और सिर से खून निकल आया था। डॉक्टर्स को अन्वेष के दिमाग ने कहते सुना था की उसके दिमाग में चोट थी और बचना मुश्किल।  पर वो कोशिश करेंगे।

मुझे बचाने की।  पर मुझे क्या हुआ।  भला मेरे ही बल बुते पर तो अन्वेष इतनी दूर चला आया।  गावं से शहर , शहर से पढाई, फिर नौकरी फिर माता पिता के खिलाफ शादी और ये आलिशान रहन सहन।  मैं क्या इतना कमजोर हूँ की इतनी जल्दी हार मान  जाऊंगा।

पता नहीं ये डॉक्टर भी किस किस चीज़ का इलाज करने लगने हैं। समस्या कुछ और थी। वो तार जो मुझे दिल से जोड़ती थी अब टूट गयी थी। मैं तो ज़िंदा हूँ पर दिल, वो मेरे बिना कुछ नहीं बोलता।  और अगर बोलता भी होगा तो मुझे पता नहीं। उसी को चलाये रखने के लिए तो इन्होने ये मशीन लगा रखी  है।  बेचारा दिल। अन्वेष के दिमाग ने सोचा।

कुछ ही देर बाद पर के बिस्तर पर भी एक और औरत को लाया गया था।  करीब पच्चीस से तीस  साल के बीच रही होगी।  उसने शायद खुद को गोली मार  ली थी।  ‘ओह , वहीँ जहाँ मैं रहता हूँ। ‘

“अगर मुझे इस तरह की चोट लग जाए तो ये लोग ऐसा क्यों सोचते हैं की मैं बिगड़ गया हूँ।  मैं तो ज़िंदा हूँ।  भाई, उस तार को ठीक करो। पर मेरी कोई सुनता ही नहीं। “

“डॉक्टर्स तो हमेशा दिमाग के अंदर समस्या ढूंढते हैं और दार्शनिक माइंड और बॉडी के सम्बन्ध को समझना चाहते हैं।  धर्म में आत्मा, दिमाग और अन्य तत्वों को समझने की कोशिश की गयी है।  पर माइंड और हार्ट की रिलेशनशिप को कोई नहीं देखना चाहता।  उस तार को कोई नहीं देखना चाहता  जिससे ज़िन्दगी बनती है। “

“हाँ अब समझा।  जिस चीज़ से वो तार बनता है उसका सामान तो इनके पास है ही नहीं। वो तार बनता है पांच सामानों से।”

अन्वेष का दिमाग लगातार अपने आस पास देख रहा था।  कुछ ही समय में आई सी यू के हॉल में तीन लोग ऐसे थे जिनका दिमाग, डॉक्टर्स के अनुसार या तो काम करना बंद कर चूका था, या कम  काम कर रहा था। किसी के दिमाग में थक्का जमा था तो किसी में कुछ और जमा था।

अन्वेष का दिमाग लगातार अपने आप से ही बातें कर रहा था।  एम्स का ये भरा हुआ आई सी यू  उसे एकदम बेचैन किये हुए था।

उसने सोचा की जिस तरह से यहाँ लोग आ रहे हैं , ऐसा लगता है अपने शौक से आ  रहे हैं।  भला ये भी कोई जगह है आने की।  इंसान जो ज़िंदा नहीं है उसे भी झुलाये रखते हैं।  पर शायद इसे ही उम्मीद कहते हैं।

अब इन्हें कौन समझाए की जिस सामान को,जैसे लड़ाई झगड़ा , विद्वेष, कॉम्पिटिशन , असुरक्षा , डर इत्यादि , धीरे धीरे दिमाग से पिघल जाना चाहिए, या दिल वाले तार से बहार निकल जाना चाहिए, आजकल वो मुझ तक पहुँचता तो है पर वापस नहीं जाता।

जब दिल वाले तार से वो दिमाग तक तो पहुँचता है पर वापस नहीं निकलता , जैसे शरीर से भोजन के अवशेष  निकल जाते है, तो मुझे परेशानी होने लगती है और मैं कोशिश करता हूँ किसी तरह उसे दिल तक पहुँचाने की। जिन्हें स्ट्रेस सिचुएशन कहते हैं, आखिर दिल अधिक सशक्त है ऐसी समस्यायों को सुलझाने में, मुझसे कहीं ज्यादा ।  मेरे और दिल की इसी कश्मकश में, इसी मशक्कत में कमबख्त तार कई बार टूट जाता है।

अब अन्वेष को ही देखिये।  शिरीन और उसके बीच का झगड़ा धीरे धीरे अन्वेष के दिल से मुझ तक पहुँचने लगा।  पहले तो वो पिघल कर निकल जाता था।  पर कुछ समय से अन्वेष उसे मुझमें ही छोड़ देता।  ऑफिस में , पार्टी में , ड्राइविंग करते समय , गाना सुनते समय , नहाते समय, खाना कहते समय और हर वक़्त।  मैंने कई बार समझाया भी की इसे वापस दिल के पास भेज दो मेरे पास इतनी जगह नहीं।

पर नहीं अन्वेष नहीं माना।  अब मैं कब तक सम्हालता।  एक दिन जबरदस्ती दिल के पास भेज रहा था की तार टूट गया। भावना, प्यार, भरोसा, संतोष और आस्था के बने इस तार में अगर इनमें से एक भी चीज कम  होना शुरू हुयी तो समझिए तार कमजोर होना शुरू।

पर क्या डॉक्टर पूरी तरह गलत थे।  नहीं।  इस तार के बिना भी चल जाता है, ठीक वैसे ही जैसे दिल का बाई पास ऑपरेशन होता है वैसे ही।  अगर आपको ऐसे साथी मिलें जो इन पाँचों  में से किसी एक भी तत्त्व को आपको भरपूर देते रहें और मुझमें जमा सामान को दिल तक पहुंचाएं या फिर बाहर निकालने  का काम करें, तो वो तार नहीं टूटता।

शिरीन और अन्वेष की शादी के बाद दोनों के दोस्त तो थे ही नहीं।  परिवार और रिश्तेदार वैसे भी छोड़ चुके थे। इन दोनों ने भी परवाह नहीं की क्योंकि आखिर सब कुछ तो था इनके  पास तो किसी और की क्या ज़रूरत । तो बाई पास सर्जरी कैसे हो दिमाग की।

तभी अन्वेष के दिमाग ने देखा , शिरीन आकर अन्वेष के बगल में बैठ गयी। थी।  चेहरा उतरा हुआ तो था पर व्यवस्थित भी था। अन्नू शायद घर पर ही होगा।  शिरीन को कितना दुःख हो रहा होगा। कितनी परेशान होगी वो।  मुझे शायद ऐसा नहीं करना चाहिए था।

तभी शिरीन ने अपने पर्स से स्मार्ट फ़ोन निकाला  और अन्वेष के चेहरे के बग़ल में आकर फोटो क्लिक करने लगी।

अन्वेष का दिमाग घबराया एक पल के लिए।  क्या कर रही है ये ?

ओह, सेल्फ़ी ले रही है।  तभी शिरीन ने फ़ोन मिलाया और किसी को कहा :

“ज़रा देखो दो अन्वेष कैसा लग रहा है हॉस्पिटल में बिना दिमाग के।  मैंने तुम्हें व्हाट्स एप्प पर सेल्फ़ी भेजी है।  फॉरवर्ड भी कर देना दोस्तों को। ”

मुझे लगा की शायद अब उस तार की आखरी उम्मीद भी जा चुकी थी।  मुझे लग रहा था जैसे सचमुच मैं डूब रहा हूँ।  आँखों   के आगे अँधेरा छा रहा था।

तभी बगल में लगे पल्स और हार्ट मॉनिटर पर अब तक आ रही आवाज़ों के साथ ऊँची नीची होती लाल लाइन सीधी हो गयी।  नर्स और डॉक्टर दौड़े पर तब तक तार पूरी तरह टूटकर बिखर चूका था।

3 thoughts on “वो तार

  1. Pingback: वो तार | ख़ामोश आवाज़ें

  2. Dear Sir,
    it is a very touching story. The vividness with which you have described the longing of the husband to rectify all the misunderstandings pertaining to his marriage does convince one to ponder over the thought of how people change completely with time and how sometimes even the pain of the other fails to move you due to the constant pain that you have witnessed in his or her company.
    Regards

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