तरक्की की आरज़ू

दिल्ली शहर के बदरपुर इलाके में दंगे भड़क उठे थे।  कर्फ्यू लगा था। यूँ तो इसकी ख़ामोशी शहर की गलियों  में दिखती है पर उसकी आवाज़ दूर तक सुनाई देती है।   इस बार इसका निशाना पलवल के पास एक गांव में रहने  अख़लाक़ का घर था।

अखलाक़ की जैसे दुनिया ही उजड़ गयी थी।  शहर में रहने वाला उसका इकलौता लड़का तनवीर दंगाईयों की भेंट चढ़ गया था । पता चला था की एक भीड़ ने उसे पीटकर जला दिया था जब वो नमाज़ के बाद मस्जिद से घर लौट  रहा था।  गावं के चौधरी रवि साहेब का लड़का भी मारा गया था।

दोनों की मोत अस्पताल में हुयी क्योंकि अस्पताल ने बिना पैसे जमा किये आइ सी यू में भर्ती करने से मना कर दिया था।  साथ ही किसी जानकार की उपस्थिति भी आवश्यक थी क्योंकि पुलिस और दंगों का मामला  था।  इसी सब में दोनों ने दम  तोड़ दिया था। आखिर जानकार कौन  होता।  इस  आधुनिक फ्लैट्स वाली कॉलोनी में आये हुए बस एक महीना ही तो हुआ था।

किसी उजड़े हुए बाग़ जैसे अपने घर घर के आँगन में गावं के लोगों के बीच बैठा अखलाक़ सोच रहा था।  उसे याद आ रहा था  वो दिन जब उसने नूर से ज़िद की थी तनवीर को शहर भेजने की।

अखलाक़ को आज भी याद था वो समय जब वो और नूर सोचा करते थे और बेहतर जीवन के बारे में, तरक्की के बारे में । इसी बेहतर जीवन की तलाश में, जिसका अर्थ किसी को नहीं मालूम होता सिवाय उसके जो उसे पाना चाहता है , उन दोनों  ने इकलौते बेटे को शहर पढ़ने के लिए भेजने का फैसला किया।  हालाँकि ये इतना आसान नहीं था।  दोनों मियां बीवी के बीच काफी बात हुयी थी इस बारे में।  अखलाक़ जहाँ शहर के पक्ष में  नूर उसके खिलाफ. अखलाक़ की आरज़ू थी की वो अपने बेटे को आगे बढ़ते हुए देखे। और आगे बढ़ने का अब नए भारत में अर्थ था शहर। आखिर पंडित नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक , सब तो शहरों को अत्याधुनिक बनाने में लगे थे।  गावं में क्या रखा है।

अखलाक़ दरजी का काम करता था गावं में।  थोड़ी सी ज़मीन  भी थी जिससे साल भर का गुज़ारे  लायक अनाज भी हो जाता था।  कुछ बच जाता था जिसे पास की अनाज मंडी में बेचकर अखलाक़ को  कुछ और कमाई भी हो जाती थी।  अखलाक़ की दर्ज़ी की दुकान भी अच्छी चल रही थी।  उसकी पत्नी नूर भी अच्छी कढ़ाई कर लेती थी। तनवीर उनकी इकलोती संतान था।  बड़े ही नाजों से पला था अखलाक़ और नूर ने उसे। कुल मिलाकर एक सुकून की ज़िन्दगी थी अखलाक़ की।पर कई बार सुकून इंसान को रास नहीं आता।  उसकी प्रवर्ति है कुछ नया कुछ बेहतर करने की , फिर परिणाम चाहे कुछ भी हो।

गावं में आखिर रखा क्या  है सिवाय रोजाना की सिरदर्दी के।  कभी किसी से कोई गुरेज़ तो कभी कोई नाराज़।  काम तो अधिकतर उधार में चलता था।  कुछ एक घर जिनका कोई परिवार सदस्य नौकरी में था , या  शहर में काम करता था , वही समय से पैसा  नहीं  कहता था, ‘अरे अखलाक़ भाई कहीं भाग थोड़े ही जायेंगे , बस अगली फसल आ जाने दीजिये , आपका हिसाब चुकता कर देंगे ‘ . अखलाक़ जानते थे की पैसा तो आ ही जायेगा पर अब की जरुरत का क्या ? दूसरा न कोई सुविधा है।  शहरों में तो  बहुत सारे हॉस्पिटल हैं सुना है।

गावों में लड़के केवल इधर उधर घूमते हैं, दूसरों के घरों की बातें करते हैं, या फिर माता पिता उनकी शादी कर जीवन के अगले पड़ाव पर उन्हें धकेल देते हैं।  बस इन्हीं में तो सिमटी है यहाँ की ज़िन्दगी।  शहरों में काम से काम लोगों के पास काम तो होता है। यही सोचकर दोनों ने तनवीर को शहर भेजने की सोची थी।

अखलाक़ नूर को यही सब समझाने में लगा था।  नूर थोड़ी चिंतित थी इस लिए नहीं की तनवीर के जाने से उसे कोई खौफ था।  उसे  लग रहा था की गावं इतनी बुरी जगह नहीं है। ‘आखिर हमारे यहाँ अपने लोग हैं।  हर सुख दुःख में वे हमारे साथ खड़े रहते हैं।  उस अनजान शहर में क्या है ऐसा।  रोजाना सुबह बस जाती है उससे चला जायेगा और शाम को  लौट आएगा।  आखिर पढ़ना ही तो है , वहां रहने की क्या जरुरत है।  आखिर किसी मुसीबत में अपने लोगों की ही तो जरुरत पड़ती है।  अकेला पैसा ही तो काम नहीं आता।”

” याद है  जब रवि भाई साहेब शहर में बीमार हो गए थे तो मुहम्मद चाचा पैसा पहुंचकर आये थे।  रामु चाचा ने कितनी बार अहमद की पढाई के लिए पैसे भिजवाये।  ये जानते हुए भी की अहमद के अब्बा वो पैसा लोटा नहीं पाएंगे।  हमें ही देख लो।  उस दिन जब तुमने सुरजीत भैया से बात की थी तनवीर की पढाई के लिए तो उन्होंने चरण कहा था कोई ज़रूरत हो पैसे की तो तुरंत बताना। यहाँ अगर कुछ समस्याएं हैं तो कुछ अच्छी बातें भी तो हैं।  शहर में कौन है अपना जो मदद करेगा ज़रूरत के वक़्त ।”

आज से कुछ बरस बाद तनवीर तो वहीँ रहना चाहेगा।  हम वहां जाकर क्या करेंगे।  न वहां काम होगा न मन लगेगा।  यहाँ दूसरों की बातें ही सही पर बात तो हैं , दोस्त और इंसान तो है।  शहर में तो सब व्यस्त हैं।  वहां कहाँ कोई किसी के पास केवल बात करने या फिर बैठने के लिए मिलता है।  उसके लिए भी तो बहाना चाहिए।  भला इंसान को इंसान के लिए बहाना चाहिए क्या ? क्या इंसान होना ही काफी नहीं ? यहाँ सब सबके लिए है।  जिसके लिए कोई नहीं उसके लिए भी कोई है।

“और उन भेदभावों का क्या जो हम गावं में देखते हैं।  कई हिन्दू घर तो हमारे यहाँ का खाते  भी तो नहीं क्योंकि हम उनके हम मज़हब नहीं हैं।  आधा गावं  तो हमें नीची नज़र से देखता है। तुम तो घर में रहती हो तुम्हें क्या पता। ” अखलाक़ ने तर्क दिया।

“इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है। हम भी तो आधे गावं के यहाँ नहीं जाते।  जो लोग हमारे यहाँ नहीं आते वो भी तो तुम्हारे यहाँ कपडा सिलवाने  आते हैं। तुम तो कितनों के यहाँ खुद ही नाप लेने या कपडा सिलने जाते हो। रामप्रसाद ब्राह्मण के यहाँ लड़की की शादी में तुमने ही तो सिलाई की थी और मैंने कढ़ाई।  उनके यहाँ हम कभी नहीं गए पर रोज़ न्योता आता था।  बाद में भी मिठाई पहुंचे थी उन्होंने।  अखलाक़ मियां सबको एक जैसी नज़र से मत देखिये। ” नूर ने कोशिश  की थी उसके नज़रिये को बदलने की।

कितना अजीब था ये द्वंद्व  भी।  कभी गावं तो कभी शहर , कभी विकास तो कभी परम्परा , कभी स्वावलम्बन तो कभी औरों पर  निर्भरता। क्या इन सब दोहरे प्रश्नों का किसी  जवाब था।  अखलाक़ सोच रहा था , काश कोई मुझे बता दे।  एक तरफ इस जगह से बरसों पुराना जुड़ाव है तो दूसरी और अपने बेटे को आगे बढ़ते देखने की तमन्ना।

नूर भी ऐसा ही कुछ सोच  रही थी। क्या जरुरी है ये गांव छोड़कर जाना आगे बढ़ने के लिए।  आखिर ऐसे आगे बढ़ने का क्या फायदा जिसमे सब कुछ पीछे छूट जाए। भला अपनों से दूर जाना भी क्या कोई विकास हुआ।  पर कहीं ऐसा तो नहीं की कल को तनवीर उसे ही जिम्मेदार ठहराए अपने भविष्य के लिए। ‘ अम्मी मेरा भविष्य और बेहतर होता अगर आपने हुज्हे नहीं रोक होता शहर जाने से पहले’, कहीं उसने ऐसा कहा तो। नूर भी परेशान थी।

पर आख़िरकार दोनों ने फैसला किया था उसे भेजने का।  पर साथ ही ये भी सोचा की उसे सिर्फ पढ़ने के लिए भेजेंगे और बाद में जब वो पढाई पूरी कर लेगा तो उसे वापस गावं ही बुला लेंगे।

उस बात को अब दस बरस हो गए थे।  इस सुकून की ज़िन्दगी को जैसे किसी की नज़र लग गयी थी। वक़्त बदला, तनवीर भी और गावं भी।  अब तनवीर की पढाई पूरी हो चुकी थी।  अखलाक़ ने उसे कहा था की वो अब गावं वापस आ जाये और गावं में ही उसका हाथ बंटाए या फिर शहर में कोई नौकरी कर ले पर शाम को गावं वापस आ जाए। नूर की भी तबियत ठीक नहीं रहती थी।

देश के साथ साथ  गावं का माहोल भी बदल गया था। अब पहले जैसा सौहार्द्रpeople-850971_640 नहीं था।  पहले सब को एक दूसरे की जरुरत होती थी कभी सामान तो कभी पैसे के लिए।  अब बैंकों ने वो जगह ले ली थी।  किसी भी ऐसी जरुरत के लिए अब पडोसी या दोस्त की जरुरत नहीं थी।  बैंक जो था सबका दोस्त उधार देने वाला , बस जमीन या घर ही तो गिरवी रखना था , या फिर गहने।
सब कहते थे देश बदल रहा है।  भारत अब चमक रहा था नयी नीतियों की बदौलत।  पर ये कैसा परिवर्तन था की अब न भाई की जरूररत थी न दोस्त की।  दोस्तों की जगह टेलीविजन और बातचीत की जगह मोबाइल फ़ोन ने ले ली थी।  अब अखलाक़ और रवि भाई काम ही मिलpeople-850971_640ते थे।   पर हाँ अब भी मिल लेते थे उसकी दुकान पर चाय के लिए।  नूर के पास तो अब कोई काम नहीं था।  सब तो बाजार से कढ़ाई वाले कपडे खरीदते थे , उसकी कढ़ाई अब कौन देखता।

तनवीर अपने अब्बु को मनाने में लगा था की अब पढाई पूरी होने के बाद भी वो शहर में ही बसना चाहता है , यहाँ गावं में नहीं।  उसे शहर गए हुए करीब एक दशक हो चला था।  ग्रेजुएशन के लिए गया था वो।  अब तो उसने डॉक्ट्रेट
भी कर ली थी।

“अब्बा आप नहीं जानते, शहरों की दुनिया कितनी आगे है।  अब भारत में भी वर्ल्ड क्लास शहर हैं जहाँ बहुत अच्छी सुविधाएँ हैं।  बेहतर सड़कें , चौबीस घंटे बिजली पानी  और सुरक्षा।  वहां पुलिस गावों की तरह नहीं होती की बुलाओ तो भी न आये या फिर हर छोटी सी शिकायत के लिए पैसे दो।  अच्छी शिक्षा है, अच्छे अस्पताल हैं। शहरों की दुनिया आधुनिक है अब्बा गावों की तरह पिछड़ी हुयी नहीं । “

अखलाक़ मियाँ लगातार तनवीर को समझने में लगे थे की वो गावं की किसी मुसलमान परिवार की लड़की से शादी कर ले और यहीं गावं में रहे।

अखलाक़ और नूर अपने बेटे की इतनी जरुरत कभी महसूस नहीं हुयी जितनी अब, इसीलिए दोनों चाहते थे की तनवीर वापस आ जाये।  पर अब तनवीर वापस नहीं आना चाहता था।  ‘अब्बा इतना पढ़ लिखने के बाद अगर मुझे इसी गन्दगी में रहना है तो क्यों मुझे  पढाया। मैं यहाँ नहीं रहना चाहता।  मुझे आगे बढ़ना है। आपसे मिलने मैं थोड़े दिनों में आ जाया करूँगा ‘, तनवीर ने बार बार यही बातें दोहराई थीं और इन्हीं सब ज़िद के बाद तनवीर चला गया।

अखलाक़ का छोटा सा परिवार जैसे तिनके सा बिखर गया था।  इस बिखराव में न कोई हिन्दू था न मुसलमान , न कोई ब्राह्मण था न कोई दूसरी ज़ात, न ही कोई किसान था या कोई जमींदार या मजदुर।  यहाँ तो सिर्फ माँ बाप की अपने औलाद से मोहब्बत थी जो आंधी में किसी पत्ते की तरह उड़ गयी थी।

सब लोग अखलाक़ को हौसला बंधा रहे थे।  पिछले तीन दिन से पड़ोसियों ने ही उसके यहाँ खाना बनाया।  अखलाक़ के यहाँ चूल्हा नहीं जला था।  पड़ोस की चुन्नी काकी और उनकी बेटी तीन दिन से यहीं थे नूर की देखभाल के लिए।  ‘घबरा मत अखलाक़ बेटा , हम सब हैं न।  ये ग़म  भी भूल ही जायेंगे।

तभी आँखों में आंसू भरे नूर अखलाक़ के पास आ बैठी।

“अखलाक़ मियां , आईये शहर चलते हैं , वहां अधिक तरक्क़ी है और पैसा भी।  प्यार, मुहब्बत और दोस्त सब वहां मिलता है , सुना है।  क्या पता मेरा तनवीर भी मिल जाए। “

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