तुम्हारे लिए

तकती रहती है उसकी आँखें अब,

उस खुले से बंद आकाश को।

इसी ने सिखाये थे देखने सपने,

इसी के साथी तारों ने दी थी सपनों को उड़ान।

पर अब वो आकाश नहीं, बल्कि

पीओपी की छत और उससे चिपका,

हर समय घूमने वाले पंखा है बस।

नींद उड़ चुकी कब की,

सपने चले गए कहीं आराम करने।

उम्मीदें भी साथ छोड़ चली है,

आगे बढ़ने की ख्वाहिशें भी छत से चिपक चुकीं।

अब तो बस है तो घर का मैनेजमेंट,

बच्चों की परवरिश, पति का ख़याल।

किसे फुर्सत इस समाज को समझने की,

किसे है आरज़ू कुछ नया जानने की।

कहाँ वो रिसर्च और कहाँ वो मेहनत

क्या होगा हासिल अगर कर भी पाए तो।

बेमानी ही तो है ये सब,

बिना किसी मतलब के।

सपने देखने और सजाने भी हैं,

तो इन्हीं लोगों, इसी समाज में, इसी माहोल में।

पर फिर भी है एक कसक सी,

इंतज़ार किसी का

जो आये और हाथ बढ़ाये, बाहें फैलाये।

जिसकी आंखों में हो एक नया सपना

जो कह रहा हो, छु लो आसमान को,

तोड़ लो तारे, जीत लो जहाां।

पर सपनों के लिए भी क्या इंसानी साथ चाहिए?

पर इस शर्त के बारे में शिक्षा ने तो कुछ कहा नहीं,

वो तो दिखा रही थी अकेला सपना,

अब तू ही बता,

इंसान चुनु या फिर सपना।

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