तू चला गया

तू बात अधूरी छोड़कर
बीच में ही चला गया।

कुछ गीत जैसे रह ही गए,
कुछ बातेँ जैसे अधूरी सी छूट गईं,
वो हंसना जैसे बीच में रह गया,
तू बीच में उठकर जो चला गया।

जिंदगी तो चलती रही,
दिन भी कटते रहे,
पर अनकहा रह गया
वो एक किस्सा,
तू बीच में ही उठकर जो चला गया।

वो चाय का प्याला
और वो चार बिस्किट
जो करते थें इंतज़ार की
कब वो छू लें हमारे होठों को,
महसूस कर लें वो गर्म सांसें
अब बस ख़ाली और बेजान हैं
तू बीच में उठकर जो चला गया।

मैं भी चल ही लूँगी,
बढ़ जाएगा तू भी आगे जीवन में,
पर क्या होगा उसे साझे सपने का,
जो बुना था हमने मिलकर
तू ऐसे बीच में उठकर जो चला गया।

क्या होगी वो चाँदनी
जो हमें देखकर मुस्कुराती थी,
क्या होगी वो धूप
जो जैसे हमीं से चमकती थी,
तू बीच में उठकर जो चला गया।

वो फूल जो मुस्कुराता था हमें देख,
हर दिन की वो सुबह
जो खिल जाया करती थी,

ये सब बस करते रहेंगे इंतजार,
ख़ाली आँखों और अधूरे होठों से
तू ये सब छोड़,
कभी न लौटकर आने ले लिए

बीच में उठकर जो चला गया
तू जो चला गया।