कहानियाँ

बचपन में सुना था कहानियाँ जीवन का अभिन्न अंग होती हैं।  बचपन में दादी या माँ की कहानियाँ , थोड़े बड़े होने पर स्कूल में पढाई जाने वाली कहानियाँ और फिर धीरे धीरे दोस्तों की कहानियाँ , और फिर बनने लगती हैं हमारी अपनी कहानियाँ।  पर क्या विवादों को कहानियों से नहीं कहा जा सकता।  प्यार, मोहब्बत और विवाद क्या साथ नहीं चल सकते।  आइये देखें।  पढ़िए और अपने विचार जरूर भेजिए बेझिझक।  मैं तो कहूँगा जो आप कहीं नहीं कह सकते यहाँ कह डालिये।  आपके विचारों का पूरा सम्मान होगा।  तो हो जाएँ शुरू। पढ़िए ये कुछ कहानियाँ मेरी ज़बानी :

तरक्क़ी की आरज़ू

मेरी पहली कहानी