वो कविता लिखी थी हमने
चीनी सी हंसी ओर गुड़ सी बातों से।
उसमें था थोड़ा सा अल्हड़पन
थोड़ी सी वयस्कता।
चंचलता से भरी थी आंखें,
पर खाली से थे होंठ।
वो लम्हा बुना था हमने,
हमारी खिलखिलाती हंसी से।
इस उम्मीद से की काश,
वो लम्हा रुके, वो रात थम जाए
जम जाए रिश्तों का वो पानी।
वो छोटी सी ज़िन्दगी जी थी हमने,
सांस लेनी की झूठी ख्वाहिश से।
इस झूठे सपने से की
करेंगे उसकी प्रतीक्षा,
थमेगा एक दिन वो पल,
पूरा होगा वो अधूरा वक़्त
वो टूटते आंसू रुकेंगे शायद।
पर तभी अचानक टूटी थी नींद।
उलझनों भरी उस घूरती सूबह ने पूछा:
किसकी इजाज़त से देखा
तुमने वो झूठा हसीन सपना?
किसकी इजाज़त से लिखी थी
ये बेतुकी, बेआधार, और लाचार सी कविता?
और वो कविता उस छोटे कमरे के कोने में खड़ी
हंस रही थी मंद मंद।
कह रही थी में हूँ ही कविता क्योंकि,
मेरा कोई आधार नहीं।