LEARNING से ज्यादा जरुरी है UNLEARNING

मेरे बहुत सरे दोस्तों में पिछले कुछ सालों में मुझे बताया की कैसे मेरा पहला ब्लॉग या मेरा परिचय पढ़कर उन्हें अच्छा लगा। अधिकतर साथियों का कहना था की मेरे परिचय में मेरे परिवेश और संघर्षों की कहानी सुनकर उन्हें एक आत्मीय बोध हुआ और वो उससे जुड़ा महसूस कर पाए। ये मेरे लिए अत्यंत हर्ष का विषय था। मुझे अच्छा लगा की मेरे लिखावट या मेरे अनुभवों से जुड़कर कुछ लोगों को मदद हुयी या जीवन के कुछ सँघर्ष शायद थोड़ा आसान हो गए। पर आज मैं जो लिख रहा हूँ और वो भी एक ब्लॉग पोस्ट में उसके मायने कुछ अलग हैं। आज का ये पोस्ट मेरे परिवेश और उसकी कहानी से ही जुड़ा है परन्तु उसके अर्थ अलग हैं।

आज जब मैं ये लिख रहा हूँ तो मेरे पीछे केवल मेरा परिवेश ही नहीं अपितु मेरे कैरियर का अनुभव भी है और जीवन के अन्य अनुभव भी हैं। साथ ही सोशल मीडिया के माध्यम से मिली ऐसी जानकारियों का अनुभव भी है जो शायद मुझे उन सब लोगों के बारे में जानने में मदद करता है जिनकी जीवन कहानी के बारे में अन्यथा मैं नहीं जान पाता। इस लिखावट के पीछे बहुत सारे दोस्तों और दूसरे पेशे से जुड़े लोगों का अनुभव भी है। और मेरी ये सोच उन सब अनुभवों से मिलकर बनी है।

जब मैंने लखनऊ में पढ़ना शुरू किया तो हमारे पास अक्सर या तो विद्यार्थी आते ही नहीं थे और अगर आते भी थे तो वो जिन्हें या तो कहीं और दाखिला नहीं मिला या फिर वो कहीं और दाखिला ले नहीं पाए यथा लखनऊ विश्वविद्यालय। जब मैं उन्हें पढ़ना शुरू करता तो हमेशा इसी बात से शुरू करता की हम सब अपने कन्धों पर परिवेश का एक बस्ता लेकर आते हैं। इस बस्ते में केवल किताबें ही नहीं होती बल्कि होती हैं कई अपेक्षाएं, उम्मीदें, सपने और इन सबसे बड़ी जिम्मेदारियां और परम्पराएं। मास्टर्स की ये यात्रा जितनी सिखने की नहीं उससे कहीं अधिक यात्रा वो उस बस्ते का भार हल्का करने की है। इसे हल्का करने के लिए unlearn करने की जरुरत ज्यादा है।

हालाँकि मैं ये बात हमेशा कहता रहा पर मुझे ये नहीं पता था की ये करना कैसे है। मुझे लगता था की ये एक तकनीकी प्रक्रिया है। बस्ते में से एक चीज निकालो , उसे नयी किताबों से भरो और हो गयी unlearning . एक दोस्त ने कहा की “अक्ल बादाम खाकर नहीं , धक्के खाकर आती है” और ये जीवन के अनुभव ही हैं जो आपको unlearn करना सिखाते हैं। ये हमें किसी किताब में नहीं मिलता और न ही किसी नुस्खे से मिलता है। ये मिलता है खुद के जीवन में झांककर देखने से, शांत भाव से स्वयं के साथ समय व्यतीत करने से।

भारतीय परिवेश में अधिकतर विद्यार्थियों की चुनौती ये है की वो सभी , जिसमें मैं स्वयं भी शामिल हूँ , ऐसे परिवेश से आते हैं जहाँ ” स्वयं ” के कोई मायने नहीं होते। उसका कोई अस्तित्व नहीं होता। भारतीय वैदिक दर्शन में जो “अहं ब्रह्मस्मि ” का सिद्धांत है वो आपको ब्रह्म की खोज के लिए प्रेरित करता है , अहम की नहीं। अहम् तो एक शर्मनाक अवधारणा है , स्वार्थी अवधारणा है। प्रत्येक मनुष्य का ये कर्तव्य है की वो अहम से ऊपर उठे और समाज के कल्याण के बारे में सोचे। समाज ही प्राथमिक है , अहम् नहीं। सेवा ही परम् धर्म है , अहम् नहीं। आज का सामजिक परिवेश जिसमें धार्मिक मुद्दों को वैसे भी अधिक अहमियत दी जाती है , सभी धर्म गुरु ब्रह्म में विलीनता को ही प्राथमिकता देते हैं। शांति का मार्ग वहीँ से होकर जाता है।

पर इस सबमें एक सवाल जो छूट जाता है वो ये है की अगर किसी का अहं से ही साक्षात्कार नहीं हुआ तो वो ब्रह्म तक कैसे पहुंचेगा। “अहं ब्रह्मस्मि ” में भी अहं ही पहले आता है। बौद्ध दर्शन में तो दर्शन का आधार ही व्यक्ति स्वयं है। पर ये स्वयं या अहं आखिर है क्या?

इसे जानने की प्रक्रिया भी स्वयं से शुरू होती है। अर्थात ये स्वयं से शुरू होकर स्वयं पर ही समाप्त भी होती है। परन्तु हमारा परिवेश इसका अनुमति नहीं देता। एक दोस्त का ये कथन की “हम तो घूमने फिरने भी काम से जाते हैं” इसका एक बेहतरीन उदाहरण है।

बचपन से हमारी परवरिश का हिस्सा है जिम्मेदारियां, और सेवा भाव। इन दोनों की शुरुआत और अंत दोनों ही परिवार के भीतर होता है। समाज उसके बाद आता है क्योंकि समाज तक जाने की सीढ़ी परिवार से होकर जाती है।

इसमें हमारी स्वयं के प्रति क्या जिम्मेदारियां हैं ये हमारे वातावरण का हिस्सा नहीं होता। अभी कुछ दिन पहले जब एक दोस्त ने मुझे ये सलाह दी की I Need to Unlearn , मुझे कुछ दिन तक तो इसका अर्थ ही समझ में नहीं आया। मुझे लगा की मैंने इतने मेहनत से ये सब learn किया है, इसे unlearn कैसे करूँ। तभी मेरे दिमाग में अपने ही वो कथन आये जो मैं अपने विद्यार्थी साथियों को कहा करता हूँ।

ये प्रक्रिया काफी दर्द भरी है। स्वयं के अंदर कुछ टूटने की प्रक्रिया आसान नहीं हो सकती। एक दूसरे दोस्त ने कहा था “जब पेड़ अपने पत्तों को छोड़ता है तो वो कोई आसान नहीं होता, जब पक्षी अपने बच्चों को उड़ना सिखाते हैं तो आसान नहीं होता , इसमें अपने ही अंदर कुछ टूटता है। ” पर इसके बाद जो बनता है वो अनूठा होता है , ताजगी और नयेपन से भरा।

और आपको जानकर हैरत होगी, या शायद अगर आपमें से कुछ ने इसकी कोशिश की हो तो शायद हैरत से अधिक आप हमदर्दी रखें , जब मैं धीरे धीरे ये प्रक्रिया शुरू की तो लगा जैसे रोज अपने अंदर कुछ टूट रहा था। मैं अपने ही अंदर बिखर रहा हूँ। और इस बिखराव को समेटने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं था। अर्थात कुछ टूट रहा था लेकिन नया बन नहीं रहा था।

और इस प्रक्रिया की शुरुआत होती है स्वयं के साथ समय बिताने से। साथ ही उन सब जिम्मेदारियों , आवाज़ों , चीखों और पुकारों को इंतज़ार करने को कहने या उन्हें नजरअंदाज करने से जो आपको आपके साथ समय बिताने से रोकती हैं। अन्य शब्दों में वो सब लोग जो आपका एक अभिन्न अंग रहे हैं, जिनसे आपको और आपसे जिनको लगाव है, जिनकी एक पुकार पर आप भागे चले जाते हैं , उनकी उन आवाजों को कुछ समय के लिए जानबूझकर , सोच समझकर एक तरफ रखकर, नजरअंदाज करके , केवल स्वयं के साथ समय बिताना।

ये स्वाभाविक ही सुनने में अटपटा लगता है परन्तु है नहीं। ऐसा करके आप एक साथ दो काम करते हैं। पहला आप स्वयं के साथ समय व्यतीत करते हैं और दूसरा , जो फिर एक दोस्त ने कहा की आप दूसरों की आप पर निर्भरता घटाते हैं। आप उन्हें भी ये बताते है की उनके अपने जीवन के अलग मायने हैं और उनका जीवन आपसे इतर भी है। ऐसे में चाहे बहन भाई हों, माँ बाप हों , या दूसरे रिश्ते हों , इन सबमें एक बंधन का भाव नहीं , एक स्वाभाविक लगाव पैदा होता है। आप स्वयं के साथ समय बिताकर खुद को जान सकते हैं और दूसरे आपसे दूर रहकर अपने लिए समय निकल सकते हैं। ये पारस्परिक विश्वास और निर्माण की प्रक्रिया है।

स्वाभाविक तौर पर ये इतना सामान्य नहीं बल्कि जटिल है। मैं इसे करने का प्रयास कर रहा हूँ। मानता हूँ की अपने आस पास के लोगों और नयी पीढ़ी को बेहतर समझने के लिए मुझे ऐसा करने की जरुरत है। अभी तक आप लोग मेरे जिस परिवेश को जानते हैं, मैं अब उस परिवेश के बस्ते को हल्का करना चाहता हूँ। इस प्रक्रिया में मेरे साथियों ने मदद की है। मुझे बताइये आप इस पर क्या सोचते हैं। अपने अनुभव मुझसे बांटिए। शायद मैं कुछ और सीख पाऊँ।

‘सामाजिक समरसता’ से ‘सामाजिक दुरी’ का सफ़र

कुछ वर्षों पहले तक भारत में अक़सर सामाजिक समरसता की बात होती थी।  हम एक मिला जुला और विविधताओं वाला समाज हैं।  यही हमारी कमजोरी भी समझी जाती रही है क्योंकि राजनीतिक विज्ञानी बताते हैं की लोकतंत्र और फ़ेडरल व्यवस्थाएं वहां आसानी से स्थापित हो पाती हैं जहाँ समाज एकसार हो।  भाषा , वेषभूषा और अन्य विविधताएं एक मजबूत राज्य व्यवस्था के निर्माण में समस्याएं पैदा करती हैं।  इन्ही विविधताओं को दुरुस्त रखने और लोकतान्त्रिक व्यवस्था को बनाये रखने के हमारे वादे ने हमें सिखाया की विविधताएं स्वाभाविक हैं और मनुष्य का मनुष्य के साथ सम्बन्ध मानवता का है, बाकी सब उसके बाद आता है।  हम ये कितना समझ पाए या नहीं वो अलग मुद्दा है परन्तु सैद्धांतिक तौर पर भारतीय समाज में इसको लेकर एक कटिबद्धता रही है।

हम हाथ मिलाने से लेकर, गले मिलने तक की परम्पराओं को धीरे धीरे और गूढ़ता से अपना रहे थे। अपने कॉलेज के दिनों में हम सब एक दूसरे से गले मिलकर ख़ुशी का इजहार करते थे।  इसमें न तो लिंग का भेदभाव था और न ही पसीने की दुर्गन्ध का सवाल। ऐसा लगता था ये तो स्वाभाविक ही है।  दिल्ली पहुँचने पर वो कम हो गया परन्तु हाथ मिलाने की परम्परा चलती रही।

इससे पहले की हम अपनी समाज व्यवस्था को पूर्णतः मानवता के इन सिद्धांतों से जोड़ पाते, नॉवल कोरोनावायरस ने इस पुरे मुद्दे को सर के बल खड़ा कर दिया है।  आज लगातार सामाजिक दुरी के प्रवचन ने जैसे हमारे दिलों में हमारे साथियों के लिए एक डर  सा बैठा दिया है।  हम घरों में बंद बैठें हैं लेकिन सोच रहे हैं किसी के हाथ में कोरोना तो नहीं , कहीं हवा में उड़कर तो नहीं आ जायेगा।  हर सामान को घूर कर देखना की कहीं कोरोना तो नहीं है , जैसे की हम उसे नंगी आँखों से देख सकते हों।

हर साथी अब एक चलता फिरता कोरोना ही नज़र आता है, साथी नहीं।  शायद दो तीन महीने के इस लॉक डाउन अनुभव में हम ये भूल ही जायेंगे की समाज में गर्मजोशी से मिलना क्या होता है।

ऐसे में ऑनलाइन टीचिंग-लर्निंग (या इसका उल्टा) का भूत ओर सर पर बैठा है। अपने विद्यार्थियों ये बात चित का माध्यम फ़ोन है या ज़ूम अंकल, या स्काइप अंकल या गूगल आंटी।  अब उन सब के चेहरे लगता है किसी दूर देश में हैं और मैं अपने कमरे से आवाज़ लगा रहा हूँ। आमने सामने बैठकर एक दूसरे की आँखों में आँखें डालकर किसी मुद्दे पर अपने तर्क को मजबूती से कहने के लिए जो मेहनत हमने की वो अब बेमानी लगती है।

थोड़े दिनों में तो अगर वीडियो कॉल में भी मास्क पहनकर बैठने लगें तो कोई हैरानी नहीं।  मास्क पहनकर सेल्फी लेते हुए लोगों को देखकर मुझे लगता है की ये घूँघट पहनकर फोटो खिंचवाने वाली महिलाओं से कम अनुभव नहीं है।  पर हम तब भी खुश थे और आज भी खुश हैं।

वैसे भी धीरे धीरे मोबाइल फ़ोन, एप्प्स , टेलीविज़न इन सबने सामाजिक दुरी को पहले ही मजबूत तो कर ही दिया था।  समाज केवल एक वर्चुअल दुनिया ही रह गयी थी, बाकी तो तकनीक ही थी। इस वर्चुअल दुनिया में मुद्दों को सुलझाने के प्रयास करने की कोई आवश्यकता नहीं – बस ब्लॉक कर दीजिये।  मामला खत्म। और तो और दूर की मध्यस्थता की भी आवश्यकता नहीं। व्यक्तिवाद को इससे अधिक मजबूती क्या मिलेगी?

पर इस सब के बीच अकेलेपन का क्या ? बहुत सारे लोग ऐसे होंगे जिनके पास तो बातचीत के लिए कोई नहीं होगा।  हंसने झगड़ने के लिए कोई नहीं होगा , क्या उनका काम केवल वर्चुअल दुनिया से चल जायेगा?

और वो जिनके पास इस दुनिया का हिस्सा बनने के लिए नागरिकता के प्राथनिक संसाधन जैसे स्मार्ट फ़ोन, इंटरनेट कनेक्शन या रिचार्ज के लिए पैसा या कैमरा और माइक और सबसे बड़ी बात एक शांत बंद चैम्बर नहीं होगा डिजिटल कम्युनिकेशन के लिए , क्या वो प्रवासी मजदूरों की तरह होंगे? नयी सदी के नए प्रवासी मजदुर !

पर शायद जब तक सब कुछ नार्मल होगा तब तक नया नार्मल पुराने नार्मल को समाप्त कर चूका होगा।  सामाजिक समरसता की अवधारणा पर कोरोना की जीत हो चुकी होगी क्योंकि फिर हम नंबर होंगे , इंसानी नाम नहीं। हमारे शरीर का डिवाइस नंबर होगा , सुगंध दुर्गन्ध, पसीना नहीं।  हम डिजिटाइज्ड हो चुके होंगे, हमारे जीवन मूल्य ‘टर्म्स एंड कंडीशंस’  में बदल चुके होंगे और रिश्ते – वो तो एप्प में तब्दील हो चुके होंगे।  नयी सदी में स्वागत है मेरे ग्रुप मेंबर्स।

सुधीर

एक और कलंक

“भाई अब ज़माना वो कहाँ रहा जो आज से दस बरस पहले होता था। तब रिश्तों की कोई क़द्र होती थी , कोई लिहाज़ होता था।  अब कौन किसकी लिहाज़ करता है।  सबको अपना जीवन ही तो चाहिए।” राजी आंटी ने संतोष आंटी से कहा।

“ठीक कहा बहिन तुमने।  आज कल के लड़के लड़कियों को देखो। सिर्फ अपना जीवन बनाने में लगे हैं।  औरों की कोई परवाह नहीं। अपना दम्भ इतना अधिक है की उससे आगे तो सूझता ही नहीं।” संतोष  आंटी ने हाँ में हाँ मिलायी।

राजी और संतोष आंटी वैसे तो आंटी नहीं थी।  उनकी उम्र यही कोई चालीस या पैंतालीस बरस के बीच रही होगी  पर दोनों को देखकर नहीं लगता था की उनकी उम्र इतनी है, दोनों देखने में पैंतीस के आस पास की लगती थी। पर भारतीय समाज का ताना बाना खास तौर पर मध्यम वर्ग का ऐसा है की  बुढ़ापा भी अपने आप में एक क्वालिफिकेशन जैसी चीज है। Continue reading