अजनबी दोस्त

वो करीब चला आया था,
कहकर की वो दोस्त था,

समा सा गया था दिल में
कहकर की वो तो हमसफर था.

मैं भी चल निकली
मान कर की वो हमराह था.

सीख ही रही थी अभी
धीरे धीरे चलना
उन राहों पर
जिनका ख्वाब हम मिलकर देख रहे थे,

थोड़ी दूर ही चले थे अभी
कि आयी धूल भारी आँधी,
सब कुछ हो गया ओझल सा जैसे,

जब थोड़ी धूल छंटी तो देखा,
वो चला जा रहा था कहीं दूर,

मैं चिल्लाई, पुकारा उसे
रोकना भी चाहा उसे,

वो जाते जाते दूर से ही बोला-
तुमने पहचाना नहीं मुझे,
मैं तो हूँ एक रास्ता,
वो तो बस निकल जाता है आगे
चला जाता है कहीं और

जो नहीं ठहरता किसी एक के साथ ,
जो नहीं होता किसी एक का दोस्त,

और मैं खड़ी रहीं स्तब्ध,
देखती रहीं
उस अजनबी हमसफर, हमकदम, हमराज़ को,

जो चला जा रहा था
अपनी ही धुन में
रास्ता बनकर
होते हुए ओझल.

जो लेकर जा रहा था
मेरे सपने
उस दूर उठती धूल में

और कह रहा था अब भी
घबराना मत
हूँ मैं तुम्हारा दोस्त और हमसफ़र ।

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