जब दोस्त छूट जाते हैं

दुःख होता है

जब दोस्त छूट जाते हैं,

वो यादें, वो साथ बांटे लम्हे

कहीं दूर छिटक कर पीछे छूट जाते हैं,

दुःख होता है जब दोस्त छूट जाते हैं।

रह जाती है मन में एक कसक,

कुछ सवाल बिना पूछे,

कुछ जवाब बिना दिए,

आधी अधूरी बातेँ लिए,

वो सारी हंसी,

वो चाय के प्याले

बिना पिए

यूँ ही खाली छूट जाते हैं,

दुःख होता है जब दोस्त छूट जाते हैं।

दिखाते हैं ख़ुद को,

कि क्या फर्क़ पड़ता है,

दोस्त तो और भी आ ही जायेंगे,

जिंदगी तो चलती ही रहेगी,

मजबूत बनना है मुझे,

इन्हीं सब गलतफहमियों में

ख़ुद को बहलाने वाले ख्यालों के

ये नरम बुलबुले फूट जाते हैं,

दुःख होता है जब दोस्त छूट जाते हैं।

दिन कटने होते जाते हैं दुश्वार,

सुबहें होती जाती हैं भारी,

शामों को जाम के वो प्याले

उन ठहाकों और बेतुके लाइनों के इन्तिज़ार में, ,

उन शीशे की अलमारियों में,

अंधेरी गली जैसे,

कहीं कोने में धूल खाते छूट जाते हैं,

दुःख होता है बहुत

जब दोस्त छूट जाते हैं,

दुःख होता है बहुत

जब दोस्त छूट जाते हैं।

तू चला गया

तू बात अधूरी छोड़कर
बीच में ही चला गया।

कुछ गीत जैसे रह ही गए,
कुछ बातेँ जैसे अधूरी सी छूट गईं,
वो हंसना जैसे बीच में रह गया,
तू बीच में उठकर जो चला गया।

जिंदगी तो चलती रही,
दिन भी कटते रहे,
पर अनकहा रह गया
वो एक किस्सा,
तू बीच में ही उठकर जो चला गया।

वो चाय का प्याला
और वो चार बिस्किट
जो करते थें इंतज़ार की
कब वो छू लें हमारे होठों को,
महसूस कर लें वो गर्म सांसें
अब बस ख़ाली और बेजान हैं
तू बीच में उठकर जो चला गया।

मैं भी चल ही लूँगी,
बढ़ जाएगा तू भी आगे जीवन में,
पर क्या होगा उसे साझे सपने का,
जो बुना था हमने मिलकर
तू ऐसे बीच में उठकर जो चला गया।

क्या होगी वो चाँदनी
जो हमें देखकर मुस्कुराती थी,
क्या होगी वो धूप
जो जैसे हमीं से चमकती थी,
तू बीच में उठकर जो चला गया।

वो फूल जो मुस्कुराता था हमें देख,
हर दिन की वो सुबह
जो खिल जाया करती थी,

ये सब बस करते रहेंगे इंतजार,
ख़ाली आँखों और अधूरे होठों से
तू ये सब छोड़,
कभी न लौटकर आने ले लिए

बीच में उठकर जो चला गया
तू जो चला गया।

पहरा

ये नया मुल्क है मेरा,
जिसमें पहरे पर भी पहरा है।

बोलने पर तो पहरे
लगते थे पहले भी,
अब तो जैसे साँसों पर भी पहरा है.

मोहब्बत पर तो पाबंदियां थीं ही,
अब तो दोस्तियों पर भी पहरा है.

नया लोकतंत्र है ये मेरा
जिसमें
पार्टियों पर कम,
वोटर पर ज्यादा पहरा है.

हर सड़क पर लटका-अटका सी सी टी वी,
झाँक रहा हो जैसे मेरे अन्दर,
क्या खाया क्या पिया,
मेरी आतंङियों पर भी पहरा है.

अगर मैं चढ़ता घोड़ी तो
ढूंढ रहें लठैत खोजते
हर एक जात मजहब वाले को की,
उसके सिर पर टोपी है या सेहरा है.

लिखने से डर लगता है,
कलम और शब्द को छोड़ो,
अब तो लगता है जैसे
कागज पर ही पहरा है.

इस नए मुल्क का क्या कहूँ
जहां पढा लिखा ही
अक्ल का अंधा भी है
और बहरा है,

ये नयी दुनिया है यारो
जिसमें ख़ूब है फोन पर आजादी,
बस हम सब के अस्तित्व पर
आधार का ही पहरा है.

ये नया मुल्क है मेरा
जहाँ हर कोई है पहरेदार
और पहरे पर भी पहरा है.

अजनबी दोस्त

वो करीब चला आया था,
कहकर की वो दोस्त था,

समा सा गया था दिल में
कहकर की वो तो हमसफर था.

मैं भी चल निकली
मान कर की वो हमराह था.

सीख ही रही थी अभी
धीरे धीरे चलना
उन राहों पर
जिनका ख्वाब हम मिलकर देख रहे थे,

थोड़ी दूर ही चले थे अभी
कि आयी धूल भारी आँधी,
सब कुछ हो गया ओझल सा जैसे,

जब थोड़ी धूल छंटी तो देखा,
वो चला जा रहा था कहीं दूर,

मैं चिल्लाई, पुकारा उसे
रोकना भी चाहा उसे,

वो जाते जाते दूर से ही बोला-
तुमने पहचाना नहीं मुझे,
मैं तो हूँ एक रास्ता,
वो तो बस निकल जाता है आगे
चला जाता है कहीं और

जो नहीं ठहरता किसी एक के साथ ,
जो नहीं होता किसी एक का दोस्त,

और मैं खड़ी रहीं स्तब्ध,
देखती रहीं
उस अजनबी हमसफर, हमकदम, हमराज़ को,

जो चला जा रहा था
अपनी ही धुन में
रास्ता बनकर
होते हुए ओझल.

जो लेकर जा रहा था
मेरे सपने
उस दूर उठती धूल में

और कह रहा था अब भी
घबराना मत
हूँ मैं तुम्हारा दोस्त और हमसफ़र ।