अद्भुत था वो देसी प्यार
नदी के किनारे प्रस्फुटित होता
हाथों में हाथ डालकर घूमते
गोद में सर रखकर लेटे,
या फिर नाव में बैठकर बतियाते
इन सभी जोड़ों का प्यार
न फ़ोन था और न रील ही थी
इनके और प्यार की भावनाओं
और संवेदनाओं के बीच
शायद नदी ने लील लिया था
वो आस पास का झंझट,
समाहित कर लिया था
उसने अपने भीतर
उन सारी पाबंदियों को
जो लगाई थीं इस ईर्ष्यालु समाज ने
ऐसे बेपरवाह प्यार पर
बच गया था इस खूबसूरत शाम में
बस उनके बीच का अनंत प्यार
विलीन हो जातीं इक दूजे में
ये दोनों नदियां
कल कल बहती
और छम -छम बहती
इस ठंडी हवा का अनंत विस्तार
यही तो था आधुनिक समय का
ख़ालिस देसी प्यार