आशा का कवि

मैं आशा का कवि हूँ ,
अगर मैं कवि हूँ तो

बसता है जिसमें उल्लास
सपने देखने का, और
उत्साह कुछ कर गुज़रने का

मैं हूँ वो कवि,
अगर कवि हूँ तो ,
जो बुनता है सपने
एक बेहतर दुनिया के

सपने, उम्मीदों और मौजों के
जो नहीं होते निराश,
नहीं मानते हार
चट्टानों से टकराकर भी

ग़र फैली हो निराशा चारों और
तब भी ढूंढ लें चमक
एक छुपी हुयी कामयाबी की

अगर मैं कवि हूँ
तो कवि हूँ
एक सुन्दर दुनिया का
जिसमें ढूंढ लेता हूँ
विवेक, तर्क और संवेदना ,
धार्मिक पागलपन और
राजनीतिक असहिष्णुता के बीच

युद्ध, विनाश और नफरतों के बीच
खोद लेता हूँ प्यार की एक सुरंग

अगर मैं कवि हूँ, तो
हूँ मैं आशा का ही कवि।

देसी प्यार

अद्भुत था वो देसी प्यार
नदी के किनारे प्रस्फुटित होता

हाथों में हाथ डालकर घूमते
गोद में सर रखकर लेटे,
या फिर नाव में बैठकर बतियाते
इन सभी जोड़ों का प्यार

न फ़ोन था और न रील ही थी
इनके और प्यार की भावनाओं
और संवेदनाओं के बीच

शायद नदी ने लील लिया था
वो आस पास का झंझट,
समाहित कर लिया था
उसने अपने भीतर
उन सारी पाबंदियों को
जो लगाई थीं इस ईर्ष्यालु समाज ने
ऐसे बेपरवाह प्यार पर

बच गया था इस खूबसूरत शाम में
बस उनके बीच का अनंत प्यार

विलीन हो जातीं इक दूजे में
ये दोनों नदियां
कल कल बहती
और छम -छम बहती
इस ठंडी हवा का अनंत विस्तार

यही तो था आधुनिक समय का
ख़ालिस देसी प्यार