कैसा होगा उस पिता का दर्द
कैसी होगी बेकसी।
सिना फट ही गया होगा दर्द से
कराह उठी होगी पूरी क़ायनात।
और वो माँ !
जिसने जन्म दिया उन दोंनो को।
युद्ध की विभीषिका के बीच ,
बचाये रखी अपनी कोख़
शायद कहीं होगी छुपी
उम्मीद की एक किरण,
जब तक ये दोनों पैदा होंगी
ख़त्म हो चुकी हो ये जंग ।
ये दोनों नन्ही जान
देख पाएं शायद एक नयी सुबह,
अमन शायद पनप पाए तब तक
नया सूरज उग पाए तब तक।
दोनों ने मिलकर सोचे होंगे उनके नाम,
सोचा होगा लड़की होगी तो क्या ,
लड़का होगा तो कौनसा नाम।,
तभी तो बनते हैं जन्म प्रमाण पत्र।
किसे पता था की तब तक
लील चुकी होगी धरती ,
जंग खा चुकी होगी वो जान,
जन्म प्रमाण पत्र बन चूका होगा
मौत का फरमान।
और दफन हो गयी होंगी
उम्मीदों की वो दास्तान,
बची होंगी तो बस ,
गोलियों की आवाज़ें
बमों का शोर
इस शोर में दब चुकी होंगी
उन मां बाप की चीखें ,
किलकारियां तब्दील हो चुकी होंगी
कराहटों में।
मानवता को दफना दिया गया होगा
किसी मज़बूत ताबूत में,
कहीं उठकर फिर न खड़ी हो जाये
और जगा दे सपना
नयी जिन्दा पीढ़ी को जन्म देने का ।
