‘सामाजिक समरसता’ से ‘सामाजिक दुरी’ का सफ़र

कुछ वर्षों पहले तक भारत में अक़सर सामाजिक समरसता की बात होती थी।  हम एक मिला जुला और विविधताओं वाला समाज हैं।  यही हमारी कमजोरी भी समझी जाती रही है क्योंकि राजनीतिक विज्ञानी बताते हैं की लोकतंत्र और फ़ेडरल व्यवस्थाएं वहां आसानी से स्थापित हो पाती हैं जहाँ समाज एकसार हो।  भाषा , वेषभूषा और अन्य विविधताएं एक मजबूत राज्य व्यवस्था के निर्माण में समस्याएं पैदा करती हैं।  इन्ही विविधताओं को दुरुस्त रखने और लोकतान्त्रिक व्यवस्था को बनाये रखने के हमारे वादे ने हमें सिखाया की विविधताएं स्वाभाविक हैं और मनुष्य का मनुष्य के साथ सम्बन्ध मानवता का है, बाकी सब उसके बाद आता है।  हम ये कितना समझ पाए या नहीं वो अलग मुद्दा है परन्तु सैद्धांतिक तौर पर भारतीय समाज में इसको लेकर एक कटिबद्धता रही है।

हम हाथ मिलाने से लेकर, गले मिलने तक की परम्पराओं को धीरे धीरे और गूढ़ता से अपना रहे थे। अपने कॉलेज के दिनों में हम सब एक दूसरे से गले मिलकर ख़ुशी का इजहार करते थे।  इसमें न तो लिंग का भेदभाव था और न ही पसीने की दुर्गन्ध का सवाल। ऐसा लगता था ये तो स्वाभाविक ही है।  दिल्ली पहुँचने पर वो कम हो गया परन्तु हाथ मिलाने की परम्परा चलती रही।

इससे पहले की हम अपनी समाज व्यवस्था को पूर्णतः मानवता के इन सिद्धांतों से जोड़ पाते, नॉवल कोरोनावायरस ने इस पुरे मुद्दे को सर के बल खड़ा कर दिया है।  आज लगातार सामाजिक दुरी के प्रवचन ने जैसे हमारे दिलों में हमारे साथियों के लिए एक डर  सा बैठा दिया है।  हम घरों में बंद बैठें हैं लेकिन सोच रहे हैं किसी के हाथ में कोरोना तो नहीं , कहीं हवा में उड़कर तो नहीं आ जायेगा।  हर सामान को घूर कर देखना की कहीं कोरोना तो नहीं है , जैसे की हम उसे नंगी आँखों से देख सकते हों।

हर साथी अब एक चलता फिरता कोरोना ही नज़र आता है, साथी नहीं।  शायद दो तीन महीने के इस लॉक डाउन अनुभव में हम ये भूल ही जायेंगे की समाज में गर्मजोशी से मिलना क्या होता है।

ऐसे में ऑनलाइन टीचिंग-लर्निंग (या इसका उल्टा) का भूत ओर सर पर बैठा है। अपने विद्यार्थियों ये बात चित का माध्यम फ़ोन है या ज़ूम अंकल, या स्काइप अंकल या गूगल आंटी।  अब उन सब के चेहरे लगता है किसी दूर देश में हैं और मैं अपने कमरे से आवाज़ लगा रहा हूँ। आमने सामने बैठकर एक दूसरे की आँखों में आँखें डालकर किसी मुद्दे पर अपने तर्क को मजबूती से कहने के लिए जो मेहनत हमने की वो अब बेमानी लगती है।

थोड़े दिनों में तो अगर वीडियो कॉल में भी मास्क पहनकर बैठने लगें तो कोई हैरानी नहीं।  मास्क पहनकर सेल्फी लेते हुए लोगों को देखकर मुझे लगता है की ये घूँघट पहनकर फोटो खिंचवाने वाली महिलाओं से कम अनुभव नहीं है।  पर हम तब भी खुश थे और आज भी खुश हैं।

वैसे भी धीरे धीरे मोबाइल फ़ोन, एप्प्स , टेलीविज़न इन सबने सामाजिक दुरी को पहले ही मजबूत तो कर ही दिया था।  समाज केवल एक वर्चुअल दुनिया ही रह गयी थी, बाकी तो तकनीक ही थी। इस वर्चुअल दुनिया में मुद्दों को सुलझाने के प्रयास करने की कोई आवश्यकता नहीं – बस ब्लॉक कर दीजिये।  मामला खत्म। और तो और दूर की मध्यस्थता की भी आवश्यकता नहीं। व्यक्तिवाद को इससे अधिक मजबूती क्या मिलेगी?

पर इस सब के बीच अकेलेपन का क्या ? बहुत सारे लोग ऐसे होंगे जिनके पास तो बातचीत के लिए कोई नहीं होगा।  हंसने झगड़ने के लिए कोई नहीं होगा , क्या उनका काम केवल वर्चुअल दुनिया से चल जायेगा?

और वो जिनके पास इस दुनिया का हिस्सा बनने के लिए नागरिकता के प्राथनिक संसाधन जैसे स्मार्ट फ़ोन, इंटरनेट कनेक्शन या रिचार्ज के लिए पैसा या कैमरा और माइक और सबसे बड़ी बात एक शांत बंद चैम्बर नहीं होगा डिजिटल कम्युनिकेशन के लिए , क्या वो प्रवासी मजदूरों की तरह होंगे? नयी सदी के नए प्रवासी मजदुर !

पर शायद जब तक सब कुछ नार्मल होगा तब तक नया नार्मल पुराने नार्मल को समाप्त कर चूका होगा।  सामाजिक समरसता की अवधारणा पर कोरोना की जीत हो चुकी होगी क्योंकि फिर हम नंबर होंगे , इंसानी नाम नहीं। हमारे शरीर का डिवाइस नंबर होगा , सुगंध दुर्गन्ध, पसीना नहीं।  हम डिजिटाइज्ड हो चुके होंगे, हमारे जीवन मूल्य ‘टर्म्स एंड कंडीशंस’  में बदल चुके होंगे और रिश्ते – वो तो एप्प में तब्दील हो चुके होंगे।  नयी सदी में स्वागत है मेरे ग्रुप मेंबर्स।

सुधीर

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