कुछ यूं आयी उभर तस्वीर
सामाजिक दूरी की,
सामाजिक दूरी बनाए रखने के ऐलान पर
इक सिरे पर थी
घर से निकल पाने की ख्वाहिश,
तो दूसरे पर थी
घर तक पहुंच पाने की गुजारिश
इक ओर थी कवायद
माह भर का सामान–ए–गुज़र जुटाने की,
तो दूसरी तरफ थीं कतारें
रोज़ी के मारों के लिए बंटते खाने की
ये कतारें भी थी उनके कारण
जो कुछ नेकदिल थे मदद के क़ाबिल,
कहाँ दूरी के दूसरे छोर को
इंसानियत का ये मौका भी हासिल
कुछ लोगों के ज़ेहन में
आते–जाते रहे फ़ुरसत के ख़्याल,
दूसरे छोर पर तो बस सताते रहे
रोज़गार के मसाएल
मुश्किलों के दौर तो
आते और जाते हैं,
सामाजिक दूरी बनाए रखने का दौर भी चला ही जायेगा
ऐ काश की ये दौर कुछ इस तरह जाता
की समाज के उस छोर की दूरी को मिटा पाता
-शैलजा