गुरिल्ला ढाबा, जनरल डायर, और ‘नो प्रॉफिट – नो लॉस’

लोगों को लगता है की जेएनयू के विद्यार्थियों को अनुशासित करने की आवश्यकता है। पर क्यों ? उनके रोज़मर्रा के जीवन में एक आज़ादी है ।पर साथ ही एक स्व अनुशासन की ललक भी। ये उसी को महसूस हो सकता है जो इसका हिस्सा रहा हो या जिसने इसको करीब से देखा हो। इस पूरी दिनचर्या में न तो लेफ्ट विंग आता है और न ही राइट। ये पूरा क्रम विचारधाराओं के संघर्ष से परे है।  जेएनयू के विद्यार्थी इन सब गतिविधियों में इतने खोजी प्रवर्ति के हैं की लगता है की ये तो कोई नयी पीढ़ी ही है जो इतना सब कुछ कर सकती है। या फिर एक पुरानी पीढ़ी फिर से जीवित होती लग रही है। वही अपने समाज, अपने विचार, अपने जगह से एक लगाव और उसे बचाने की एक ललक। आज़ादी के संघर्ष  का मंज़र भी तो कुछ ऐसा ही था।

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मिसाल के तौर पर विद्यार्थियों की एक नयी खोज है ‘गुरिल्ला ढाबा’। पूरी तरह विद्यार्थियों द्वारा संचालित। जैसा की पहले तो नाम से ही समझ आता है की ये किसी किस्म का ढाबा है, मगर गुरिल्ला ! अक्सर गुरिल्ला को गुरिल्ला युद्ध से जोड़कर देखा जाता है। तो फिर ये ढाबा कहाँ से आया ?

दरअसल शायद प्रतिरोध की संस्कृति इस विश्विद्यालय के कण कण में बसी है। विरोध के स्वर इसके खून में है।  इसी लिए जब प्रशासन ने विद्यार्थियों को ‘ठीक’ करने के लिए ढाबों का टाइम परिवर्तित करना शुरू किया और ये फ़रमान जारी किये की ढाबे देर रात तक खुले नहीं रहेंगे तो विद्यार्थियों के सामने अपनी ढाबा संस्कृति को बचाने का सवाल उठ खड़ा हुआ।

जब मीडिया के लोग अक्सर ये सवाल पूछते हैं की आपको नहीं लगता की यहाँ के विद्यार्थी पढाई – लिखाई छोड़ यही सब विरोध प्रदर्शन करते रहते हैं तो मेरा यही प्रत्युत्तर होता है की यहाँ पढाई केवल क्लास के अंदर ही नहीं उससे बाहर भी होती है।  अलग अलग नीतियों का पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ेगा ये शायद पर्यावरण विज्ञानं में पढ़ाना न हो पाए, क्योंकि उनका फ़ोकस पर्यावरण सम्बंधित वैज्ञानिक तथ्यों और प्रणालियों पर होता है,  पर ढाबे पर होने वाले अलग अलग विषयों से आने वाले विद्यार्थियों के बीच पारस्परिक वैचारिक आदान प्रदान में पर्यावरण की राजनीति और अलग अलग देशों और नेताओं या विश्व संगठनों की भूमिका समझने में विद्यार्थियों को मदद मिलती है।  इसी प्रकार एक से दो घंटे के लेक्चर में शायद एक ही विषय के सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक पहलुओं को समझाने का समय न मिल पाए , क्लासरूम के बहार के वार्तालाप उस बहस को आगे बढ़ाने में मदद करते हैं।

वास्तव में क्लासरूम के बाहर की ये पढाई ये समझने में मदद करती है की समाज में शक्ति और सत्ता की भूमिका क्या है। केवल किताब ज्ञान, लेख और लेक्चर ही इन तत्त्वों को समझने के लिए काफी नहीं होते। किस प्रकार डिनर पार्टीज और दूसरे नेटवर्किंग के साधनों की नीति निर्माण से नीति लागु करने की प्रक्रिया में कितनी अहम् भूमिका होती है- ये सारी बातें शायद एक अध्यापक एक निश्चित समय के लेक्चर में न कर पाए । पर ये अनौपचारिक वाद विवाद इन सारी प्रक्रियाओं को समझने में मदद करता है। अलग अलग नीतियों और समाज के कृत्यों का एक आम नागरिक के रोजमर्रा के जीवन में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से  क्या प्रभाव पड़ता है इसकी समझ विकसित करने में ढाबा संस्कृति मदद करती है।

यही कारन है की कुछ लोगों को ये भी लगता है की जेएनयू की संस्कृति ‘एंटी-इस्टैब्लिशमेंट’ वाली होती है या फिर बहुत अधिक प्रतिरोध और प्रदर्शनों वाली होती है। निश्चित ही जो संस्कृति समाज में सत्ता और शक्ति (पावर) को समझने समझाने के लिए प्रयास करेगी वो उन शक्तियों के खिलाफ आवाज़ भी उठाएगी जो एक प्रकार की राजनीतिक संस्कृति को बढ़ावा देती हो और जिसमें ये सवाल उठाना ही अपने आप में गुनाह हो।

ऐसे में इन सब तत्त्वों को ‘अनुशासित’ करना अत्यंत आवश्यक हो जाता है। आखिर हैं तो विद्यार्थी ही।  इनकी इतनी हिम्मत। विद्यार्थी तो विद्यार्थी हैं।  उन्होंने अपनी इस संस्कृति को जिवंत रखने का एक नया तरीका ढूंढ निकाला।  उन्होंने  एक ऐसा रूप सोचा  जगह से दूसरी जगह घूमता रहता है , वो आज कहाँ हैं और कल कहाँ ये बताना मुश्किल है। इसी लिए इसको गुरिल्ला ढाबा नाम दिया गया।  ये ढाबा बस चाय पीने और बातचीत करने का एक माध्यम है। और तो और इस ढाबे पर चाय बिस्कुट के पैसे नहीं देने होते।  जितना अपनी श्रद्धानुसार जो देदे वही चाय की कीमत है।

इस ढाबे का स्वरुप विचित्र होता है।  जहाँ एक और एक पब्लिक लेक्चर चल रहा होगा किसी अहम् मुद्दे पर, वहीँ दूसरी और कुछ विद्यार्थी गिटार पर प्रतिरोध के संगीत बजा रहे होंगे।  एक और कोई कविता पढ़ रहा होगा  और एक और कुछ लोग पोस्टर बना रहे होंगे।  एक और कुछ विद्यार्थी चाय बना रहे होंगे, और बिस्कुट, चिप्स के साथ लोगों को बाँट रहे होंगे।

पर समस्या तो है।  ये किसी शॉपिंग मॉल के बड़े रेस्तरां का मॉडल नहीं जहाँ आप दो सौ रुपये देकर चाय पियें।  न ही ये किसी मल्टीनेशनल कंपनी का आउटलेट है जहाँ महंगे सैंडविच या बिस्कुट मिलें।  ये तो ये तो वास्तव में जनता का मजमा है।

पर जब मैं ये सब देखता हूँ तो भावुक हो उठता हूँ। आज़ादी के संघर्ष के समय में भी ऐसा ही होता था, ऐसा मैंने किताबों में पढ़ा है। एक जज्बा था आपस में मिल जुल कर तात्कालिक परिश्थितियों को समझना और उनका अर्थ निकालने का प्रयास।  ये एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया के समान था जैसे। आज़ादी के बाद भी कुछ समय तक तो ये जज़्बा रहा पर धीरे धीरे बाज़ार और अमेरिका बनने की हमारी लालसा ने इन सांगठनिक  गतिविधियों का महत्त्व समाप्त प्राय कर दिया।  गांवों में लगने वाली चौपालें, शादी ब्याह , जन्म या मृत्यु के समय लोगों का ये मजमा लगना , इकट्ठा होना और फिर गांव के व्यक्तिगत मुद्दों से लेकर देश विदेश की राजनीति तक सब कुछ वार्तालाप में शामिल होना, ये सब ऐसे जन संवाद के माध्यम ही तो थे।

पर हुक्मरानों को ऐसे जन संवाद से सबसे अधिक ख़तरा लगता है। वो जानते हैं की ऐसे जनसंवाद लोगों को जगाने में मददगार हो सकते हैं।  आपस में बातचीत करते लोग सबसे बड़ा ख़तरा होते हैं सत्ता के लिए।  इसी लिए धारा 144 लगाई जाती है।  इकट्ठा होना मना है।

जलियाँवाला बाग़ में बैठे वो हज़ारों लोग भी तो यही कर रहे थे। जनरल डायर को यही तो चिढ़ मची की इन गरीब देश के गरीब, अनपढ़ लोगों की ये मजाल जो यहाँ एक साथ बैठकर बातचीत कर रहे हैं।  बस, फिर क्या था ? गोलियों और लोगों को भुनने का वो दर्दनाक मंज़र, जो कोई भारतीय शायद ही कभी भुला पायेगा, इतिहास के पन्नों में अमिट अध्याय सा दर्ज़ हो गया।

आज़ादी के बाद पिछले सत्तर वर्षों में भारतवर्ष में गाँधी, भगत सिंह कम और जनरल डायर प्रचुर मात्रा में बने हैं। आज हर जगह गुरिल्ला ढाबा की ही ज़रूरत बन पड़ी है। अब तो लगता है चारों और धारा 144 ही लगी हो जैसे। सस्ती चाय और वो भी विचारों की गर्मी के साथ मिलना लगभग नामुमकिन सा हो गया है।  चाय की थेडियों, प्रेस क्लब की सस्ती चाय, कैंटीनों के सस्ते समोसे और चाय, या ढाबों के सस्ते परांठे और पूड़ी सब्जी की जगह धीरे धीरे कैफ़े कॉफ़ी डे, मैक्डोनाल्ड या फिर जेएनयू के बगल में बने तीन महाकाय, विशालकाय, भीमकाय और असमानता की प्रतिमूर्ति शॉपिंग मॉल ने ले ली है।

आज के जनरल डायर भी नए हैं। वो गोलियों से भूनने की बजाय एक नया विचार रखते हैं। जलियांवाला बाग़ जैसी जगह पर एक मॉल बना दो , या फिर मोटी एंट्रेंस फी टिकेट के साथ रख दो। जब लोग अंदर घुस ही नहीं पाएंगे , या ये बाग़ या मुफ्त के पार्क बचेंगे ही नहीं तो लोग इकठ्ठे कहाँ होंगे। बस ये है नए भारत का मॉडल।  सब जगह सुन्दर मॉल, एकदम सुव्यवस्थित, हर चीज का दाम, अंदर घुसने से लेकर बहार निकलने तक चारों और विज्ञापन ही विज्ञापन। और सबसे बड़ी बात कोई राजनीति नहीं।  राजनीति और जनता का क्या काम।

जनता भी बेवजह ज़िद करती है। राजनीति और अर्थव्यवस्था को जनरल डायरों या फिर वायसरायों (या वाईस चांसलर) के हवाले छोड़ देना चाहिए।  जनता तो मॉल जाये और मौज उड़ाए।  अगर पैसे हैं तो खरीदकर मौज करे नहीं तो देखकर।

सब कुछ सुव्यस्थित। केवल कुछ ही अच्छे सुसभ्य सुसंस्कृत लोग खरीदने वाले – सिविल लाइन से आने वाले , या राष्ट्रवादी लाइन से आने वाले। और बाहर खड़े होकर कुछ लोग देखने वाले। पर शांत।  ये देख रहे लोग पूरी तरह शांत हों। अगर उनमें लालसा है ये सब खरीदने की तो फिर उतरें बाजार में, सीखें खरीदने और बेचने की कला। ये  गुरिल्ला ढाबा या फिर सस्तेपन का भूत,  ये सब तो आधुनिक भारत या अमेरिकी भारत , जो की एकमात्र शक्तिशाली भारत होगा विश्व शक्ति और विश्व गुरु ,उसकी पूरी परिकल्पना के लिए घातक है। वास्तव में ये लोग उस परिकल्पना को साकार होते हुए नहीं देखने चाहते।

गतिविधियों का महत्त्व समाप्त प्राय कर दिया। गांवों में लगने वाली चौपालें , शादी ब्याह , जन्म या मृत्यु के समय लोगों का ये मजमा लगना , इकट्ठा होना और फिर गांव के व्यक्तिगत मुद्दों से लेकर देश विदेश की राजनीति तक सब कुछ वार्तालाप में शामिल होना , ये सब ऐसे जन संवाद के माध्यम ही तो थे।

पर हुक्मरानों को ऐसे जान संवाद से सबसे अधिक ख़तरा लगता है। वो जानते हैं की ऐसे जनसंवाद लोगों को जगाने में मददगार हो सकते हैं।  आपस में बातचीत करते लोग सबसे बड़ा ख़तरा होते हैं सत्ता के लिए।  इसी लिए धारा 144 लगाई जाती है।  इकट्ठा होना मना है।

जलियाँवाला बाग़ में बैठे वो हज़ारों लोग भी तो यही कर रहे थे। जनरल डायर को यही तो चिढ़ मची की इन गरीब देश के गरीब, अनपढ़ लोगों की ये मजाल जो यहाँ एक साथ बैठकर बातचीत कर रहे हैं। बस, फिर क्या था ? गोलियों और लोगों को भुनने का वो मंज़र जो कोई भारतीय शायद ही कभी भुला पायेगा, इतिहास के पन्नों में अमिट अध्याय सा दर्ज़ हो गया।

आज़ादी के बाद पिछले सत्तर वर्षों में भारतवर्ष में गाँधी, भगत सिंह कम और जनरल डायर प्रचुर मात्रा में बने हैं। आज हर जगह गुरिल्ला ढाबा की ही ज़रूरत बन पड़ी है।  सस्ती चाय और वो भी विचारों की गर्मी के साथ मिलना लगभग नामुमकिन सा हो गया है।  चाय की थेडियों, प्रेस क्लब की सस्ती चाय, कैंटीनों के सस्ते समोसे और चाय, या ढाबों के सस्ते परांठे और पूड़ी सब्जी की जगह धीरे धीरे कैफ़े कॉफ़ी डे, मैक्डोनाल्ड या फिर जेएनयू के बगल में बने तीन महाकाय, विशालकाय, भीमकाय और असमानता की प्रतिमूर्ति शॉपिंग मॉल ने ले ली है।

आज के जनरल डायर भी नए हैं। वो गोलियों से भूनने की बजाय एक न्य विचार रखते हैं। जलियांवाला बाग़ जैसी जगह पर एक मॉल बना दो , या फिर मोटी एंट्रेंस फी टिकेट के साथ रख दो। जब लोग अंदर घुस ही नहीं पाएंगे , या ये बाग़ या मुफ्त के पार्क बचेंगे ही नहीं तो लोग इकठ्ठे कहाँ होंगे। बस ये है नए भारत का मॉडल।  सब जगह सुन्दर मॉल, एकदम सुव्यवस्थित, हर चीज का दाम, अंदर घुसने से लेकर बहार निकलने तक चारों और विज्ञापन ही विज्ञापन। और सबसे बड़ी बात कोई राजनीति नहीं।  राजनीति और जनता का क्या काम।

जनता भी बेवजह ज़िद करती है। राजनीति और अर्थव्यवस्था को जनरल डायरों या फिर वायसरायों (या वाईस चांसलर) के हवाले छोड़ देना चाहिए।  जनता तो मॉल जाये और मौज उड़ाए।  अगर पैसे हैं तो खरीदकर मौज करे नहीं तो देखकर।

सब कुछ सुव्यस्थित। केवल कुछ ही अच्छे सुसभ्य सुसंस्कृत लोग खरीदने वाले – सिविल लाइन से आने वाले। और बाहर खड़े होकर कुछ लोग देखने वाले। पर शांत।  ये देख रहे लोग पूरी तरह शांत हों। अगर उनमें लालसा है ये सब खरीदने की तो फिर उतरें बाजार में, सीखें खरीदने और बेचने की कला। ये  गुरिल्ला ढाबा या फिर सस्तेपन का भूत,  ये सब तो आधुनिक भारत या अमेरिकी भारत , जो की एकमात्र शक्तिशाली भारत होगा विश्व शक्ति और विश्व गुरु ,उसकी पूरी परिकल्पना के लिए घातक है। वास्तव में ये लोग उस परिकल्पना को साकार होते हुए नहीं देखने चाहते।

नए भारत में वो दिन भी दूर नहीं जब विश्वविद्यालयों में शॉपिंग मॉल होंगे और पढ़ने के लिए इन्ही मॉल से होकर जाना होगा। आखिर विश्वविद्यालयों को अपनी आय तो अर्जित करनी होगी। ‘नो प्रॉफिट-नो लॉस’ के सिद्धांत के आधार पर मुनाफा तो बनाना होगा। कोई गौर से देखे, हमारे देश में कितने निजी शिक्षण संस्थान इसी सिद्धांत पर तो चल रहे हैं। ये बेचारे ‘जिओ विश्विद्यालय’ जैसे संस्थानों को इसी लिए तो इतने बड़े अनुदान और सरकारी ‘इंस्टिट्यूट ऑफ़ एमिनेंस’ की आवश्यकता पड़ी।  वो बिना किसी मुनाफे के अपनी यूनिवर्सिटी बनाने में लगे हैं, इतने नेक काम के लिए तो मंत्रालय का कर्तव्य है की मदद के लये आगे आये। गुरिल्ला ढाबा जैसे विचार ऐसे नेक इरादों को नेस्तनाबूद करने का प्रोजेक्ट है।ऐसे टुकड़े टुकड़े गैंग को ठीक करना तो ज़रूरी है। तो नए जनरल डायर  तो चाहिए। आखिर सरकार है किसलिए? ‘नो प्रॉफिट- नो लास’ जैसे मुनाफों को आगे बढ़ाने के लिए ही तो है।

मैं तो सोचकर मंत्रमुग्ध हो जाता हूँ। जरा सोचिये: जेएनयू कैंपस में चार पांच सीसीडी, दो तीन हल्दीराम , दो चार स्टारबक्स (शाकाहारी खाना और बढ़िया दूध बेचने वाले), और एक बढ़िया बिग बाजार और पैंटालूंस।  और सब ‘नो प्रॉफिट – नो लॉस ‘ के नेक सिद्धांत पर चलने वाले।  और विद्यार्थियों के लिए डिस्काउंट कूपन और रिवॉर्ड पॉइंट अलग से।  और हॉस्टल, एकदम फाइव स्टार होटल के माफिक।  सीधे ओयो एप्प से ऑनलाइन बुक किया, डिस्काउंट लिया और फटाफट एक ऑनलाइन डिप्लोमा, कोर्स, डिग्री की । और बस हो गया नयी अमेरिकी यूनिवर्सिटी, जो क्यूआरएस रैंकिंग में टॉप 500 में आएगी, का सपना साकार।

न रहेगा जलियांवाला बाग़ , न ज़रूरत धारा 144 की और न गोलियां बरबाद।  क्यों है न इक्कीसवीं सदी का नया जनरल डायर का विज़न। और डायर की ज़रूरत है इन मदमस्त विद्यार्थियों को अनुशाषित करने के लिए।  इन्हें सिखाने के लिए की समय से सोना,  गुरुओं की इज़्ज़त करना , और नो प्रॉफिट नो लॉस के विज़न में रहना स्वस्थ्य के लिए कितना लाभकारी है।  खास तौर पर महिलाओं के लिए, कितना आवश्यक है सभ्य कपडे पहनकर घूमना, समय से हॉस्टल में वापस आना और अच्छे बच्चों की तरह व्यवहार करना। जब बड़े कुछ कहें तो चुपचाप उन्हें आज्ञाकारी बच्चे की तरह मान लेना।

ये बहस, ये नाफ़रमानी, ये विरोध प्रदर्शन विद्यार्थियों को शोभा नहीं देता। उन्हें बस पढ़ना है अच्छे बच्चों की तरह , इस नए भारत के लिए जो दिखेगा अमेरिका की तरह चमचमाता और ‘आधुनिक’ । और बिना किसी स्वार्थ के चलने वाले, नो प्रॉफिट नो लॉस के नेक सिद्धांत पर चलने वाले शॉपिंग मॉल और उसमें आधुनिक सुविधाओं से युक्त विश्वविद्यालय।

ऐसे में ढाबों और गुरिल्ला ढाबों की क्या ज़रूरत?  बस चाहिए नए जनरल डायर।  और वो हमारे पास हैं प्रचुर मात्रा में।  और उन्हें बचाना एक लोकतान्त्रिक सरकार का कर्तव्य है। आखिर कल को जिओ यूनिवर्सिटी जैसे या फिर व्हाट्सप्प यूनिवर्सिटी जैसे परमार्थ, धर्मार्थ संस्थाओं को चलाने के लिए भी तो ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता होगी।

अच्छा बहुत हो चूका। अब मैं चलता हूँ।  सुना है एक नयी विश्व प्रसिद्ध यूनिवर्सिटी में एड-हॉक / गेस्ट मास्टर की जरुरत है। और वहां कोई राजनीति नहीं है। सब सुव्यवस्थित है मॉल के जैसा, जाते ही तुरंत वाई फाई भी मिल जाता है, हर क्लास और स्टूडेंट के पैसे मिलते हैं। जितनी बढ़िया दुकान चलाओ उतने पैसे। नो प्रॉफिट – नो लॉस के आधार पर।  कोई भेदभाव नहीं। सब समान।  सबको एक जितने पैसे देने हैं, सबको एक तरह ता ट्रीटमेंट, पूरा फेयर सिस्टम।

हाँ कुछ ख़ास सिस्टम भी हैं, अगर आपने प्रीमियम स्टूडेंटशिप ली तो तीन महीने में मास्टर्स , अगर आर्डिनरी ली तो दो साल में, और फ़ेलोशिप वाली ली तो तीन साल में , और खूब फ़ेलोशिप हैं भी। सोचिये कितना अच्छा है , गरीब के लिए भी और अमीर के लिए भी। लेकिन कोई भेदभाव नहीं , पूरी तरह समान समाज।

मैं चलता हूँ। नए भारत और नयी यूनिवर्सिटी में आपका स्वागत है।

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