नाले का प्यार और गली ब्वॉय

 

गल्ली ब्वॉय फिल्म ने भावुक कर दिया था। ये कहानी थी एक ऐसे लड़के की जो अपने रोज़मर्रा के संघर्ष से ऊपर उठकर अपने लिए आधुनिक समाज में एक जगह बनाता है।  उसका संघर्ष ही इस फिल्म की कहानी लगती है।  पर इसमें कुछ लम्हे ऐसे हैं जो शायद इतनी गहराई से दर्शक का ध्यान न आकर्षित कर पाएं। संघर्ष के साथ साथ ये एक ऐसी मोहब्बत की कहानी भी है जो किसी शॉपिंग मॉल , महंगे कॉफ़ी हाउस , या फिर किसी बड़े कृत्रिम पार्क के आस पास, या किसी खूबसूरत नदी के किनारे बने लव स्पॉट (जो गुजरात में अहमदाबाद में  साबरमती नदी और उत्तर प्रदेश में लखनऊ में गोमती नदी के तट पर बने हैं यूरोप की तर्ज़ पर) नहीं थी।  ये धारावी के दो स्लम- कॉलोनियों के बीच बहने वाले एक (गंदे) नाले पर बने पुल पर थी।

इस नाले में पानी के ऊपर बनी पॉलीथिन की परत इस प्रेम कहानी का प्रेमानुकूल माहौल बनाता है। एक युवा लड़के और लड़की के बीच की ये मोहब्बत उन सामाजिक बंधनों के खिलाफ विद्रोह को दिखाता है जो उन्हें अपनी ज़िन्दगी को खुलेपन और आज़ादी से जीने से रोकते हैं।ये उस सोच के खिलाफ भी है जो कला को रोकने की कोशिश करता है।

दूसरी प्रचलित प्रेम कहानियों से इतर इस कहानी में लड़की को प्रेम का इज़हार करते हुए दिखाया गया है।  और प्रेम के इन लम्हों का केंद्र भी यही नाले का पुल है जिसमें पॉलीथिन ही रंगीन भूमिका है। इसी प्रेम कहानी का केंद्र है लड़की का पढाई के लिए लगातार संघर्ष करना।

हालाँकि लड़के के संघर्ष में लड़की के ये संघर्ष कहीं छिप से गए हैं पर उसका खुलकर ये कहना की “मैं भी एक साधारण लड़की जैसा जीवन जीना चाहती हूँ” प्रचलित सामाजिक फिरकापरस्त नियमों पर प्रहार है।ये वास्तव में गलियों का संघर्ष था जो महंगे घरों, बंद कॉलोनी या शॉपिंग मॉल में नहीं बल्कि गली – कूचे, घरों के बीच, छोटे घरों में रोजमर्रा के जीवन में होता है।  जिसमें नए साल के पल अपने आप को बताने वाले पल आते हैं की ‘अपना भी दिन आएगा।’  इसमें मोहब्बत फूलों, कार्ड्स, और गिफ्ट के आस पास नहीं होती, कीचड़, रेल के डिब्बों, बस की सीटों पर, या नालों के पुलों पर होती है।  शहरों को प्रेमानुकूल प्रेम के स्थान नहीं बल्कि प्रेम करने वालों की  भावनाएं बनाती हैं।

ये चुनौती है भारतीय समाज के कलाकारों, लेखकों और कमेंटेटर्स के लिए की वो मोहब्बत की नयी भाषा (language), नए स्थान (साइट्स), और नयी अभिव्यक्तियों (expressions) को कैसे और कहाँ स्थान देते हैं।  कला का एक रूप जो की एक मानवीय भावनाओं को एक ‘चीज़ (commodity), और बाज़ार (market) के आस पास ही दिखाता है, एक दूसरा भारत उस बाज़ार और अर्थव्यवस्था के साथ साथ अपने लिए एक नयी जगह बना रहा है। इसका केंद्र न तो कोई एक स्थापित परम्परा है और न ही पुराने उपलब्ध तरीके। एक नया युवा वर्ग अपने लिए नए तरीके तलाश रहा है। इसमें तकनीक भी है और नया बाजार भी। इस नए युवा की सोच को समझना और उसके तरीकों को समझना कला वर्ग के सामने एक चुनौती है।

इक्कीसवीं सदी का साहित्य और कला का विकास बाज़ारू संस्कृति के आस पास नहीं वरन इन नयी अभिव्यक्तियों और विप्लव के नए चित्रों और आवाज़ों के आस पास होगी। ये हमारे जैसे रिसर्चर और अकादमिशन के सामने नए समाज को समझने की चुनौती है। नयी सदी का समाज विज्ञानं इन्ही से तय होगा।  उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के यूरोपीय और नए पैदा हो रहे धर्म और संस्कृति आधारित (हिंदूवादी, इस्लामी या क्रिस्चियन) समाज विज्ञानो से नहीं।