कहीं पर अटकी सी, कहीं पर लटकी सी
बिन सिर पैर की, मेरी ये बेमानी सी कविता।
सपने हैं किसीके आँखों में, होठों पर उतरते नहीं,
शायद किसी के प्यार में, सनकी सी एक कविता।
धुनें है पर बजती नहीं, महफिलें हैं पर सजती नहीं
शाम है, सुबह भी, धुप भी है और छाँव भी,
अल्फ़ाज़ भी हैं, भाव भी हैं, कहना चाहता हूँ, बोलना नहीं
कुछ कहने-सुनने के इंतज़ार में, रुकी रुकी सी एक कविता।
सब कह तो कह चूका मगर, अब भी कुछ बाकी है दोस्तों
कहीं पर अटकी सी, कहीं पर लटकी सी
बिन सिर पैर की, मेरी ये बेमानी सी कविता।