मानसी अभी भी विचारों की उधेड़बुन में थी। आख़िर इस खुबसूरत जंजाल से वो बाहर निकले भी तो कैसे? खुबसूरत, क्योंकि शायद किसी का साथ, किसी का एहसास तथा आपको ये आभास की शायद कोई आपके लिए है, अपने आप में एक बेहद रोमांचक, गुदगुदा और अलग सा भावनात्मक आवेग है। और जंजाल, क्योंकि इस एहसास के साथ जुड़े हैं किसी और के भी एहसास, किसी एक और अपने की यादें और रिश्ते । ये अपनापन भी अजीब चीज़ है ना, कभी आपको किसी मज़बूती की दिलाता है दूसरे ही पल किसी कमज़ोरी का। अब मैं निकल कर किस तरफ जाऊं? उसे लग रहा था रहा था की इतनी बेचैनी तो शायद उसे तब भी नहीं थी जब उसे अनुज ने छोड़ने का फ़ैसला कर लिया था।
हालाँकि शायद दर्दों की कोई तुलना नहीं होती। हर दर्द अपने आप में एक ख़ास दर्द होता है। जब वो होता है तो लगता है शायद इससे बड़ा दर्द न पहले कभी था और न ही आगे कभी होगा। हर समय का दर्द एक अलग ही तरह की कसक के लिए होता है। अनुज के जाने के बाद लगता था की इस दर्द के सामने दुनिया का हर दर्द कम ही होगा। हर दर्द से लड़ सकती हूँ मैं- मानसी अपने आप को यही बताया करती थी। जब समीर मेरे जीवन में आया तो लगा की शायद जीवन में फिर वो रंग भर जाएँ जो पहले थे। पर अगले ही पल दिल और दिमाग को जैसे बिजली का करंट मार गया था।
“पागल हो गयी हो क्या मानसी? क्या सोच रही हो ? ये पागलपन ही नहीं , एक नैतिक गुनाह भी है ये सोचना। तुम और समीर ! आखिर तुम ऐसा सोच भी कैसे सकती हो। तुम जानती भी हो तुम किसके बारे में सोच रही हो। याद है न समीर कौन है। अमीषा का पति है वो। तुम्हारी दोस्त का पति।”
अपने ही भीतर किसी तूफ़ान को महसूस कर रही थी मानसी। ये तूफ़ान उड़ीसा के तटों या चेन्नई के बंदरगाहों को झकझोर देने वाले समुद्री तूफानों से भी कहीं अधिक विनाशक था, घातक था। मन ही मन एक आत्मग्लानि महसूस हो रही थी। उसे लग रहा था था की वो कोई अपराधी हो जैसे।
“पर अपराधी मैं अकेले ही क्यों, समीर क्यों नहीं? उसने भी तो उसके एहसासों को जगाने में कोई कमी नहीं छोड़ी।”
मानसी जैसे अपने आप से अपने आप को बचने की कोशिश कर कर रही थी।
पहली बार जब हम दोनों जब तीन मूर्ति में अकेले मिले थे तो पहली ही बार में हम दोनों ने कितनी सारी व्यक्तिगत बातें बता डाली थीं, स्कूल के दिनों से लेकर शादीशुदा जीवन तक। शुरू तो पता नहीं उस दिन किसने किया था पर बढ़ावा तो उसी ने दिया था। व्हाट्सएप्प पर मैसेज करना, ईमेल लिखना, अपनी हर कहानी और कविता को मुझे पढ़ने के लिए देना, मुझे बताना की मैं उसके लिए कितनी ख़ास हूँ , ये सब तो उसी ने किया ना? वो चाहता तो दूरियां बढ़ा लेता। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।
“मेरी स्थिति तो अलग थी। मैं तो पहले ही इतनी सारी मुश्किलों में घिरी थी। ऐसे में लगा की कोई है जिससे बात की जा सकती है तो कर ली। अब भला इसमें मेरा क्या कसूर है। क्या मुझे बतौर इंसान एक दूसरे इंसान से बात करने का भी हक़ नहीं है? क्या मुझे भी पुरानी औरतों की तरह अपने दर्द को दिल में दबाये मर जाना चाहिए था? अगर ऐसा है तो फिर अभिव्यक्ति के इन ढेर सरे माध्यमों – व्हाट्सएप्प, फेसबुक , ट्विटर , मोबाइल का क्या फायदा। इन क़िताबो , शायरियों , कविताओं , कहानियों के क्या मायने हैं ? ये सिर्फ क्या दूसरों की बातों में हामी भरने और नकली लाइक्स देने के लिए हैं ? काम से काम मेरे लिए तो ऐसा कभी नहीं था। मेरे लिए अभिव्यक्ति मेरा अधिकार है। इतने साल तक स्टूडेंट्स पॉलिटिक्स रही और आज अपनी बरी आयी तो पर्सनल मन कर किसी चीज भुगतती रहूँ और कुछ न बोलूं। ये तो नाइंसाफी हुयी न। खुद से भी और अपने अआप से भी। नहीं मैं ऐसा नहीं कर सकती।”
मानसी को विचारों के ये झंझवत उठाकर एक बार इस किनारे पटकते दूसरे किनारे। और जितना उससे निकलने की कोशिश करती है उतना ही उसमें और उलझ जाती।
अगले की पल उसके दिमाग ने समीर के पक्ष में गवाही देना शुरू किया।
“हाँ मगर ऐसा है तो ये अधिकार – विचारों को बाँटने का – समीर को भी तो है। उसने भी तो मुझसे शेयर ही किया न, कुछ और तो माँगा नहीं कभी।”
“पर मेरी गाथा भी तो अलग है। मैंने तो अनुज को नहीं छोड़ा , उसी ने मुझसे अपना साथ छुड़ा लिया । मैंने तो खुद को उससे, और उससे अलग जीवन के लिए तैयार कर ही लिया था। मैंने तो एक दूसरे जीवन को गूंथना भी शुरू कर दिया था। लेकिन समीर के मामले में तो समीर छोड़ना चाहता है। मेरे अपने संघर्ष में इसी बीच समीर कहीं से आ टपका था?“
मानसी खुद से ही सवाल पूछती और खुद से ही उसका उत्तर दे डालती। बाहर हलकी सी सर्दी थी। मानसी अभी अभी तीन मूर्ति लाइब्रेरी से लौटी थी। ये लाइब्रेरी उसे अपने जीवन का सबसे बड़ा सहारा मालूम होती थी। थकान लग रही थी मगर चाय का मग भर कर मठरी हाथ में लेकर आ बैठी थी वो, खिड़की के किनारे। ये लकड़ी की खिड़की जो उसके कमरे से बाहर का दृश्य अंदर लती थी , उसकी करीबी दोस्त थी। इन्हीं सब विचारों की उलझनों में चाय कब ठंडी हो गयी उसे पता ही नहीं चला ।
“ उफ्फ, बड़ी मुश्किल से आते ही हिम्मत बटोरकर चाय बनायीं। अब कमबख्त को फिर से गर्म करना पड़ेगा।” तभी उसे याद आया पिछली बार समीर जब घर आया था तो उसने पुछा था –
“मैं चाय गर्म कर दूं?”
वही पहली और आखरी बार था। तीन महीने बीत गए उस बात को।
एक बार तो मानसी का मन हुआ की “काश वो फिर से पूछे तो मैं कहूँगी – कर दो न गर्म”। पर मैं क्या इतनी कमजोर हूँ, दूसरे ही पल उसके मन ने कहा?
“एक गर्म चाय के प्याले के लिए उस पर निर्भर रहूं। कभी नहीं। मुझे अकेले आता है जीवन चलना और मैं जानती हूँ की इससे कैसे लड़ा जाता है। जीवन में इतना आगे बढ़ने के बाद मैं ये सब मैनेज कर सकती हूँ।”
यही सब सोचते हुए जैसे वो फिर से जैसे नींद से जगी। कमर को हाथ लगाते हुए अंगड़ाई लेते हुए उठी चाय गर्म करने के लिए।
लेकिन तभी बहार एक भीड़ निकलती दिखाई दी, सांस्कृतिक महिला मोर्चा की रैली थी शायद। काफी महिलाएं साड़ियां पहने हाथ में भगवा झंडा लिये नारे लगाती हुयी जा रहीं थी :
“हमारी संस्कृति पर हमला नहीं सहेंगे।”
इसी बीच में एक लड़की , जिसकी उम्र शायद 20 -25 साल होगी , ज़ोर से हाथ उठाते हुए बोली –
“हमारी संस्कृति ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद ।”
भीड़ ने ही उसकी हाँ में हाँ मिलते हुए यही नारा दोहराया।
पिछले हफ्ते ही शायद कुछ दूर किशनगढ़ की एक बिल्डिंग में एक नवदम्पत्ति की बड़े दर्दनाक ढंग से हत्या कर दी गयी थी। लड़का मुसलमान था, शायद, और लड़की हिन्दू। काफी तनातनी हो गयी थी माहौल में क्योंकि कुछ पड़ोसियों का कहना था की शायद दोनों में शादी नहीं हुयी थी और दोनों तब साथ साथ रहते थे, live -in रिलेशनशिप में ।
पर ये live – in का कांसेप्ट तो वसंत कुञ्ज , डेफ को या चाणक्यपुरी जैसे एलीट और पॉश कॉलोनी में काफी प्रचलित है। ये किशनगढ़ गांव शहर में कहाँ ? और वैसे भी शादी तो हमारे समाज में ‘सिंगल आइडेंटिटी यूजर’ की तरह का लाइसेंस है। अगर आपके पास ये वाला कार्ड है तो वोटर आयी-डी , आधार कार्ड , इनमें ये कोई भी इतना ताकतवर नहीं। one license serves all the purpose .
इन्हीं अमीरीयत वाले इलाकों से सटे दूसरे इलाकों में तो आज भी खाप पंचायत जैसी व्यवस्थाएं काम करती हैं। जब तक ठीक चले तो ठीक लेकिन जिस दिन मामले ने सांप्रदायिक तूल पकड़ा उस दिन सारा मेट्रोपोलिटन कल्चर एक तरफ़ और हमारा ‘इतिहास’, ‘संस्कृति’, ‘उच्च जीवन मूल्य’ एक तरफ़। आज सुबह ही तो मुसलमान समुदाय ने भी इसी तरह संस्कृति की दुहाई देते हुए रैली निकली थी और अब आज ये।
“पता नहीं हमारा देश और ये समाज कुछ मुद्दों पर कब सोच से आगे बढ़ेगा। जहाँ गरीबी, अशिक्षा, भूखमरी और कुपोषण का अम्बार लगा है वहां आज भी बड़ा मुद्दा ये है की कौन किसके साथ रहता है या कौन किस ज़ात – धर्म में शादी करता है। कैसी और किसकी संस्कृति यार , गिव मि अ ब्रेक “, मानसी ने एकदम चिढ़ते हुए सोचा।
चाय गरम करने के लिए आगे जाते हुए मानसी रैली देखकर रुक गयी थी। पुनः उसने रसोई की और कदम बढ़ाये , मग माइक्रोवेव में रखा साठ सेकंड के लिए और वाशबेसिन पर मुहं धुलने के लिए झुकी। तभी आईने में अपना चेहरा दिखा। एक पल के लिए उसके चेहरे पर छोटी सी मुस्कराहट फ़ैल गयी।
“वाह रे मानसी। चली थी फिर से अपनी छोटी सी दुनिया बसाने। घंटा। चल अब चाय पी और खुश रह।”
तभी माइक्रोवेव ने बीप बीप किया तो उसने आगे बढ़कर मग लिया और लौट कर सोफे पर आ बैठी। सामने ही उसकी यूनिवर्सिटी के दिनों की दोस्तों के साथ पिकनिक की फोटो टंगी थी। उसे अपने पिछले दिन याद आ रहे थे।
“जब से ये नयी सरकार आयी हर मुद्दा हिन्दू और मुसलमान का है, खाने पीने , रहने , बोलने से लेकर बिज़नेस तक। इंसानियत तो जैसे कहीं पीछे बैठी हो इस नए बदलते तंग माहौल में। अब सब हैं संस्कृति के ठेकेदार।“ रैली के बाद कुछ देर के लिए मानसी का ध्यान अपने विचारों से हट गया था।
शायद अगर आप सामाजिक सरोकारों से वास्ता रखते हैं तो अपने व्यक्तिगत मुद्दे छोटे लगने लगते हैं। वो कहीं जाते नहीं पर हाँ खुद से आगे भी एक ज़िन्दगी है और खुद से बड़े भी कुछ मुद्दे हैं , इसका अहसास इंसान को बराबर होता रहता है। लेकिन आखिर से सड़ी गली परम्पराएँ और स्ट्रक्चर इंसान को एक सहर तो देते हैं। अकेले मरने के लिए तो नहीं छोड़ देते। अब तो ये बेआधार जीवन है जिसमें सब है पर कुछ भी नहीं।
“पर इन सबमें समीर का क्या। उसकी भी तो ज़िन्दगी उलझी है न।”
मानसी को एक पल के लिए लगा की जैसे उसे किसी ने फिर से धक्का दिया है विचारों के उसी गड्ढ़े में गिराने के लिए। पर इस गिरने में एक अजीब सा सुकून भी था।
“समीर को तो लगता है जैसे की वो जिसके साथ है वो मज़बूरी में है। दोनों एक दूसरे से प्यार नहीं करते पर कोई किसी से कहने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। दोनों के बीच एक अजीब सी अनकही अनसुनी ख़ामोशी सी है। समीर कुंठा सी भर गयी हो जैसे। उसकी बातों से तो लगता है जैसे . . . . ?
“पर मैंने भी तो उसको कहा था की जो रिश्ता आपको कमज़ोर करे ऐसे रिश्ते में रहने का कोई आशय नहीं।”
“आख़िर मुझे भी तो नहीं कहना चाहिए था शायद। उसकी ज़िन्दगी थी जैसे चाहे चलाता, मैं भला क्यों उसके कर्मों की भागीदार बनूँ।”
मानसी बीच बीच में कभी अपनी किसी बात को याद करती और सोचती आखिर उसने ऐसा क्यों किया। उसे नहीं समझ आ रहा था की किसे गलत कहे , समीर को या खुद को।
“ये दिलों के मसले भी , पता नहीं कहाँ से शुरू होते हैं , कहाँ खत्म हो जाते हैं।”
चाहकर भी वो इस बात का अर्थ नहीं निकाल पा रही थी को क्यों वो परेशानी में थी।अपनी दोस्त और उसके जीवन साथी के बीच में आने के कारण या फिर अपने और समीर के बीच के किसी अनजान से रिश्ते की आशंका को लेकर।
पर दो महीने पहले ही समीर ने अमीषा को साफ़ साफ़ कह दिया था की वो अब रिश्ते में और नहीं चल सकता। बाद में हालात बदतर हों इससे अच्छा है हम अभी से अपने रस्ते अलग कर लें। पर इसके बाद समीर का कोई पता नहीं था। पिछले छः महीनों में पहले तीन महीनों में हम दोनों जितने करीब आये अगले तीन महीनों में उतनी ही तेज़ी से दूर भी चले गए थे। और ये भी मुझे ही करना पड़ा। कभी उसके मैसेज का जवाब न देकर तो कभी उसकी फ़ोन कॉल को जानबूझकर जवाब न देकर।
“और आखिर करती भी क्या मैं, आखिर मुझ पर एक नैतिक दवाब भी था। और समीर ने भी तो कभी खुल कर कुछ कहा नहीं की वो मुझे चाहता है या उसने आगे के जीवन के बारे में क्या सोचा है। मैं भी अँधेरे में कितनी दूर चलती आखिर।”
“बस मैं ही एकतरफा अटकलें लगाती रहीं। मुझे तो लगा था की शायद वो है ही ऐसा- अपनी व्यक्तिगत समस्याओं को भावनात्मक रूप देना उन लोगों के सामने जो खुद किसी कारन से भावनात्मक रूप से कमजोर हों , जैसे की शायद मैं अनुज के जाने के बाद, दूसरी लड़कियों सहानुभूति लेना और उनका मानसिक और शारीरिक भी शायद शोषण करना। उसने ख़ुद भी बताया था की अमीषा भी उसके बारे में यही सोचती थी। इतने सालों से जानती थी , उससे बेहतर और कौन जानेगा। यही उसका चरित्र था शायद। मर्द सब साले एक जैसे होते हैं। कमीने खुदगर्ज़ साले। पर पिछले कितने महीनो से उसने मुझसे मिलने या बात करने की कोई कोशिश नहीं की। मैंने दो या तीन मैसेज का जवाब नहीं दिया और फिर उसने कभी कोई मेसेज नहीं किया ”
“मगर अमीषा गलत भी तो हो सकती थी , आखिर यही तो समीर तो समीर को शिकायत थी।”
“पर मैं क्यों ऐसा सोच रही हूँ। शायद अब ये क़िस्सा इसी तरह रहेगा।“
मानसी को लग रहा था की वो बार बार इन्हीं विचारों में डूब रही थी , जितना बहार आने की कोशिश करती उतनी ही गहराई में डूबती जाती। दलदल था शायद। या फिर ये शायद विचारों का ज्वार भाटा था जिसमें विचारों की लहरें एक बार चढ़ती और उसे उठा ले जाती पर दूसरे ही पल वापस उतरती और उसे धरातल पर ला पटकतीं।
इसी बीच में मोबाइल की घंटी बजी। फ़ोन उठाने का मानसी का मन नहीं था पर फिर भी उसने थकी आखों से डिस्प्ले स्क्रीन पर देखा।
“ओह , अमीषा कॉल कर रही है।“ एक बार तो मानसी का मन घबराया, “काश सब ठीक हो“, इन्हीं आशंकाओं के बीच उसने फ़ोन उठाया।
“हाय अमीषा, कैसी हो? बड़े दिनों बाद फ़ोन किया। अभी बैठी बैठी तुम्हारे ही बारे में सोच रही थी।” फ़ोन उठाते ही उसने तपाक से कहा।
“हाँ यार, कितने दिन हो गए तुमसे मिले हुए, जब से तुम लौट कर आयी मुलाकात ही नहीं हुयी। आज मन किया तो सोचा पुछुं। तुम तो ख़बर लेती नहीं। क्या कर रही हो अभी ” अमीषा ने उधर से हँसते हुए कहा।
“कुछ नहीं यार। मैं और मेरी तन्हाई। मन-मष्तिष्क की ढेरों लड़ाइयां हैं उन्ही से रोज़ रूबरू होती हूँ। वही कर रही थी।” मानसी ने बुझे मन से कहा।
“तो एक काम कर , तुरंत घर आ जा , खाना साथ खाएंगे और गप्पे भी मारेंगे। तुमसे ढेर सारी बातें करनी है। मना मत करना। कितनी देर में आओगी ? अमीषा ने जैसे एक ही साँस में सब कह डाला था।
“पर अमीषा।“ इससे पहले की मानसी अपनी बात पूरी करती अमीषा ने कहा “मैंने पूछा नहीं मैडम, कहा है।”
मानसी थकी थी और जाने के स्थिति में नहीं थी पर लगा की इसी बहाने इतने दिनों बाद समीर को देख लेगी, पता नहीं कैसा है वो।”अच्छा ठीक है , एक घंटे में आती हूँ।“ उसने कहा और फ़ोन काट दिया।
जल्दी जल्दी मानसी तैयार हुयी। समीर को देखने के ख्याल से ही उसकी थकान कहीं चली गयी थी जैसे। मन ही मन एक अजीब सी आशंका भी थी। “पता नहीं कैसे उसे देखूंगी, कहीं दोनों के लिए अजीब सी सिचुएशन न हो जाये।“ अमीषा की जानकारी के बगैर वो और समीर तीन चार बार मिले थे। एक बार शायद किसी कॉफ़ी हाउस में। उसे समीर से मिलना अच्छा लगता था , उससे बात करना, उसके साथ समय बिताना उसे रोमांचित कर देता था। पर इस आत्मग्लानि के भाव से निकलने के लिए उसे दूरियां बढ़ानी पड़ीं थीं, इस रिश्ते की सीमाएं तय करनी पड़ी। वो भी समीर को मिस करती थी पर ये बात कहती किससे।
“कौन समझेगा इसे जब खुद समीर ही नहीं समझ पाया ? आखिर सामाजिक रीति रिवाज़, नियम कानून इंसान के प्रोग्रेसिव विचारों से अधिक मजबूत होते हैं। एक अकेला इंसान क्या इन कानूनों, दीवारों को तोड़ सकता है? फिर मुझसे भला ऐसी उम्मीद क्यों की जा रही थी ?”
इन्हीं सब विचारों में उलझते हुए मानसी ने गाड़ी की चाभी उठायी और निकल पड़ी। इन्हीं सब उलझनों के साथ कुछ देर में वो अमीषा के घर के दरवाजे पर थी। तेज़ सांसों को कण्ट्रोल करते हुए उसने डोर बेल पर ऊँगली रखी। इससे पहले की घंटी पूरी बजती अमीषा ने दरवाजा खोल दिया जैसे की दरवाज़े के पास ही खड़ी इंतज़ार कर रही थी। अमीषा ने उत्साह से मानसी को गले से लगा लिया।
“कितने दिनों बाद मिल रहे हैं न हम।“ अमीषा ने उसे गले लगते हुए कहा।
“दिन नहीं, महीनों बाद। नवंबर में मिले थे। तीन महीने होने को आये।“ मानसी ने मुस्कुराते हुए कहा था।
“और तुम सुनाओ क्या चल रहा है ? ” उसने उसी मुस्कराहट से पूछा।
“कुछ खास नहीं वैसे तो, पर कुछ नया है जो तुम्हें बताना है पर पहले बैठो, सांस लो और ये बताओ क्या लोगी- रेड वाइन या तुम्हारी फेवरेट व्हिस्की , अमीषा ने चुटकी लेते हुए कहा था।
“अरे वाह , क्या बात है , आज तो मिज़ाज़ ही कुछ और हैं। खैर इतने प्यार से पूछ रही हो तो मैं तो व्हिस्की ही लूंगी।“ मानसी ने जवाब दिया।
“मैं तो ठीक हूँ पर तुम्हारा चेचर क्यों बुझा है? सब ठीक है?” अमीषा ने पलटकर पुछा।
“अरे हाँ, बस काम की थकावट और लाइब्रेरी की दौड़-धूप। कुछ रिसर्च प्रोजेक्ट्स के लिए अप्लाई करने की सोच रही थी , उसी प्रपोजल के लिए तीन मूर्ति जाती हूँ। बस वही थकान है। दो -चार घूंट में सब ठीक हो जायेगा। “ माहौल को हल्का बनाने के लिए मानसी ने कहा।
“वैसे घर इतना शांत क्यों है , बाकि लोग कहाँ हैं ?”
इतनी देर से समीर के नहीं दिखने से मानसी को बेचैनी होने लगी थी।
“बाकि लोग! अरे हाँ , वही तो तुम्हें बताना था। मां तो गयी है ऋषिकेश धार्मिक यात्रा पर, दस पंद्रह दिन में आएगी। और समीर गया है जीवन यात्रा पर पता नहीं कब आएगा।” अमीषा का चेहरा ये कहते कहते कुछ बदल सा गया।
उसके चेहरे पर दुःख तो नहीं था पर हाँ बड़ी मुश्किल से उसने ये बात पूरी की। फिर उसने व्हिस्की का गिलास मानसी की और बढ़ा दिया।
“ये धार्मिक यात्रा तो सुना था, पर जीवन यात्रा क्या है ? समीर भी कुछ न कुछ एडवेंचर करता ही रहता है।” मानसी ने पुछा।
उसके भाव उत्सुकता वाले थे , आशंका वाले थे या फिर ख़ुशी के, या फिर मिले जुले से , कहना मुश्किल था।
“करीब दो महीने पहले समीर ने मुझे कहा की वो इस रिश्ते में शायद नहीं रह पायेगा। उसे घुटन होती थी मेरे साथ, दम घुटता था उसका। उसे लगता था उसके जीवन की तरक्की में सबसे बड़ी बाधा मैं ही थी। मैंने भी उससे कहा की ये मत समझो की तुमने भी कोई कमी छोड़ी है। तुम्हारे ही व्यक्तिगत और सामाजिक पचड़ों में मैंने अपना जीवन और कैरियर बर्बाद किया। तुम बेहद ही बेगैरत और धोखेबाज इंसान हो , और मुझे भी ऐसे इंसान के साथ रहने में कोई दिलचस्पी नहीं। इसके बाद उसने कहा की को अलग रहना चाहता है। एक हफ्ते बाद ही उसने बताया की उसे वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में पोस्ट-डॉक्टरेट फ़ेलोशिप मिल गयी है तीन साल के लिए। जाने से दो दिन पहले उसने कहा की वो छः महीने बाद वापस आएगा और तलाक़ के कागज़ भी भिजवा देगा। सारा सामान तो वो यहीं छोड़ गया ये कहते हुए की उसे इसकी ज़रूरत नहीं। कल रात की फ्लाइट से वो चला गया। मैंने सोचा तुम्हें शायद जाने के बारे में मालूम होगा क्योंकि उसने कहा की उसने तुम्हें बताया है। पर तुमने अभी पूछा तो मुझे लगा की शायद तुम्हें नहीं मालूम।” अमीषा ने बिना सांस लिए या रुके ये साड़ी बात धड़ धड़ कह डाली।
मानसी को लगा जैसे उसके उद्वेलित मन में इस बार एक सुनामी उठा था और ये लहरें उसके मन की दीवारों को तोड़ते हुए उसके चेहरे के भावों के रास्ते बाहर निकल आयी थी।
उसे महसूस हुआ जैसे उसका दिमाग रेल की पटरी है जिस पर शताब्दी ट्रेन दौड़ी जा रही है या फिर एक रन-वे है जिस पर तेज रफ़्तार से फ्लाइट दौड़ कर टेक ऑफ करने जा रही है। या फिर जैसे एक नए जीवन के मायने मिटा गए हों। आधार ढूंढती ये ज़िन्दगी शायद फिर बेआधार हो गयी थी।
उसे लगा वो रो पड़ेगी पर किसी तरह उसने अपनी भावनाओं को काबू किया और ये जताते हुए की जैसे उसे कोई मानसिक फर्क नहीं पड़ा ये सब जानकर , फ़ोन की स्क्रीन की तरफ़ देखते हुए बोली,
“सॉरी अमीषा, एक मिनट आयी। ये कॉल मुझे अटेंड करनी होगी।”
तपाक से ये कहकर वो बहार बालकनी में निकल आयी। बहार कड़ाके की ठण्ड हो गयी थी। पर मन की गर्मी ने मौसम की ठडक पर विजय पा ली। मानसी की आँखों में आंसू निकल आये। शायद वो खूबसूरत जंजाल अब मिट चूका था। न खूबसूरती थी न जंजाल। साथ थी तो बस ये कड़ाके की ठण्ड, मन के भीतर का सुनामी, और वो तनहा शामें जिन्हें काटना अभी बाकि था।