गलती से एक ख्वाहिश पाल बैठा था जब पीएचडी कर रहा था। कुछ नासमझ फिल्मों को देखकर शायद ये फ़ितूर चढ़ा था। फ़ितूर था नोबेल प्राइज जितने का। इस फ़ितूर में कई भावनाएं जुडी थीं। समाज के लिए कुछ कर गुज़रने की भावना , अपने उन लोगों के लिए कुछ करने का जुनून जो आपकी तरफ़ किन्हीं उम्मीदों से देखते हैं , सोचते हैं की जब ये आगे बढ़ेगा तो हम भी आगे बढ़ेंगे , इसकी तरक्की में हमारी तरक्की है , उनकी आँखों में कई ख्वाबों को उतरते देखना। एक बार एक दोस्त के साथ डी स्कूल (D School/ Delhi School of Economics) गया तो उसने वो गेट दिखाया जो इस इंतज़ार में था की कब कोई भारत में रहने वाला भारतीय d स्कूल का स्कॉलर acadimician जब नोबेल लेकर आएगा और उसे खोलेगा। उस गेट को देखकर शायद मेरा इरादा और भी पक्का हो चला था। ऐसा लगा था की अपने करोड़ों देशवासियों के प्रति शायद ये मेरा नैतिक दायित्व था की मैं मेहनत करूँ।
नोबेल पुरस्कार कुछ विषयों में, और सामाजिक विज्ञानं में इकोनॉमिक्स, में कुछ नया और सामाजिक रेलेवंस का कंट्रीब्यूट करने पर मिलता है। मेरा तो सब्जेक्ट भी वो नहीं था। इसलिए राहें और भी मुश्किल थीं। पर भावनाओं के रास्ते आने वाले जुनून शायद और कोई भाषा नहीं समझते। इसी को शायद दीवानगी कहते हैं , पागलपन या मूर्खता भी शायद यही होता है। इश्क़ भी यही होता है ये तो कह नहीं सकता। पर इतना विश्वास खुद पर हो चला था की मैं ये कर सकता हूँ। कहाँ से आया ये विश्वास मुझे खुद को भी मालूम नहीं था।
इन भावनाओं में शायद मैं इतना बह गया था की अपनी ज़मीं ही भूल बैठा। ये भी भूल बैठा मेरी अपनी कुछ ज़मीनी हक़ीक़तें थें जिन्हें मैं चाहकर भी पार नहीं कर सकता था। था तो आखिर एक भारतीय ही, परिवार, ज़िम्मेदारियाँ और अपने आस पास के लोगों के साथ का जुड़ाव चाहकर भी कुछ चीजों से हमें ऊपर नहीं उठने देता।
इन सब के बीच मैं तो ठेठ गांव के माहौल से आया था। गांव में भी उस माहौल से जो सामंतवाद, पुरुष प्रधान समाज का मूरत रूप था। राजस्थान के उस इलाके से जो हरित क्रांति के कारन तथा महाराजा गंगा सिंह की दूरदर्शिता के कारन आर्थिक रूप से तो संपन्न हो गया था पर मानसिक रूप से किसी भी पिछड़े इलाके से अधिक पिछड़ा था। जातपात हमारे खून में कूट कूट कर भरा था। जाट समाज के प्रभाव के कारण हमें बचपन से सिखाया गया था की आदमी जैसी बात करे औरतों जैसी नहीं। औरतों को पैर की जूती समझना चाहिए। और भी न जाने क्या क्या ?
ऐसी सोच में विकसित हुए दिमाग के सामने पहली चुनौती थी खुद से संघर्ष की। जेएनयू के माहौल ने एक नया शब्द हमें सिखाया था – प्रगतिशील होना। इस शब्द का अर्थ समझने में ही मुझे तक़रीबन एक दशक लगा। 1999 में जेएनयू में पहुंचा था , एम् ए , एम् फिल तथा पीएचडी ख़तम करते करते एक दशक निकल जाता है, प्रगतिशीलता का अर्थ समझने में शायद पूरा दशक ही निकल गया।
चुनौतियाँ कोई एक नहीं थीं। मेरा ग्रेजुएशन और स्कूलिंग सब हिंदी मीडियम में थीं। अंग्रेजी सिखने की ललक मुझमें बचपन से ही थी और इसके लिए जी तोड़ मेहनत भी मैंने की। पर दिल्ली आने पर मालूम हुआ की वो मेहनत पर्यापत नहीं थी। अभी तो एक लंबा सफर तय करना बाकि था। ग्रामर से लेकर वॉक्यूबलरी तक सब पर मेहनत की दरकार थी। और इन सब पर सबसे बड़ी चुनौती थी की आपसे बात करके लगना चाहिए था की आपको अंग्रेजी आती है। जब पहली बार जेएनयू कैंपस आया था तो सीधी मुलाकात हुयी थी एक ऐसी लड़की से जो सिगरट पी रही थी और उसके धुएं में ही उसने मुझसे बात की थी। मैं जो ऐसे माहौल से आया था जहाँ स्मोकिंग एक बहुत ही गलत सामाजिक आदत समझी जाती थी , ख़ास तौर पर महिलाओं के लिए (मजेदार ये था की करते सभी थे ), ये सब देख कर झटका खा गया था।
कुछ लोगों ने बताया था की राजस्थान के उस इलाक़े से आने वाले लोग , जहाँ से मैं आया था , यहाँ ज़्यादा दिन नहीं टिकते थे। घबराया सा मैं पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंचा था जहाँ पर गंगानगर के लिए बसें मिलती थीं। स्टेशन पर बैठे एक ठेले पर चाय पीते हुए, ऍफ़ एम् पर गाने सुनते हुए मैंने मन ही मन ये तय किया था की पीछे मुड़कर नहीं देखूंगा। खुद से वादा किया था की चाहे मुझे कितनी भी मेहनत क्यों न करनी पड़े , कितनी भी रातें क्यों न जागना पड़े , मैं वापस नहीं जाऊंगा। यही रहकर लड़ूंगा। ऐसा लगा था जैसे की ये कैंपस अब मेरा रण स्थल था और मैं इसमें एक नया सैनिक। मेरा कोई दुश्मन नहीं था सिवाय खुद के। अपनी वो कमजोरियां, और सामाजिक बैगेज ही शायद मेरे सबसे बड़े दुश्मन थे।
लड़ाई शुरू हुयी और करीब पांच छः साल लगातार चलती रही। शायद धीरे धीरे मुझे महसूस होने लगा की अब मै विजय के करीब था। खुद बनाये इन सब मोर्चों पर मैंने जैसे तैसे जीत हासिल कर ही ली थी। पर अब धीरे धीरे एक नया मक़ाम सामने था – प्रगतिशीलता का। इसका सही अर्थ अब मालूम चलने लगा था। एक बात शायद अब भी मुझमें घर की हुयी थी -दुष्यंत भैया कहते थे ये गंगनागरियों की एक समस्या थी। प्रगतिशीलता का अर्थ और शर्तें भी मेरी ही होंगी। मैं खुद सीखूंगा की ये क्या है और उस तक कैसे पहुंचेंगे। ये जिद और अखड़पन बड़ा घातक होता है पर था शायद मुझमे।
इसी सब में शायद समय निकलता चला गया। दशक तो बिता ही कुछ साल और भी। सामाजिक तौर पर मैं उस सोच और विचारधारा से बहुत हद तक बहार निकल आया था जो मैं अपने साथ लाया था। इसीलिए अब लगने लगा था की शायद सपने देखने का अधिकार भी मुझे था। कुछ साथियों ने भी हौसला बढ़ाया।
जीत के इसी विश्वास और परिवर्तन की इसी सकारात्मक लहार ने मुझमे ये विश्वास जगाया की शायद मैं भी जीवन में कुछ हासिल कर सकता हूँ। इसी खोज में जा पहुंचा जॉन नाश की जीवनी आधारित फिल्म a beautiful mind देखने. पता नहीं क्यों और कैसे उस फिल्म ने मेरे मन मष्तिष्क को प्रभावित किया की बस कुछ करने का भूत चढ़ बैठा।
कहते हैं मंजिलें तय करने से पहले इंसान को अपनी कमजोरियों और मजबूतियों को जान लेना चाहिए और फिर कदम बढ़ाना चाहिए। अपनी पुरानी जीतों की मदहोशियों में चकना चूर मैं ये सब तो जैसे भूल ही बैठा। केवल आगे बढ़ने की धुन सवार थी। पीछे मुड़कर देखना क्या होता है ये शायद मैं भूल गया था। अब तो बस सपने की तरफ चलना बाकि था। ऐसा लगता था रातों को जैसे वो मेरे सामने खड़ा हो और कह रहा हो देखो मैं यहाँ हूँ बस चलते रहो, यहाँ तक पहुँच जाओगे। बस फिर क्या था , विजय से पहले ही घमंड में चूर मैं मदमस्त हाथी की तरह मैं चल पड़ा था।
इन सब में ये भूल गया था की अब मैं जिस समाज में रहता था उसका अपना एक चरित्र है। एक सफल अकैडिमिशन बनने के लिए भी तो आपको ये महसूस होना चाहिए आप कुछ जानते हैं। आखिर आपकी सोच के सही और गलत , असरकारक या बेअसर होने का पैमाना तो आपके आस पास के लोग या आपके साथी ही होते हैं। उन्हें तो लगना चाहिए की आप आगे बढ़ रहे हैं। ऐसा नहीं था की मेरे आस पास मुझे हौसला देने वाले लोग नहीं थे। ऐसे कई साथी या शुभ चिंतक थे जो बार बार ये एहसास दिलाया करते की मैं कुछ कर रहा हूँ और और बेहतर कर सकता हूँ।
पर ऐसे भी कई साथी थे जिन्हें लगता मैं अपनी ‘औकात’ से अधिक ही आशावान था अपनी क़ाबलियत के बारे में , अपनी मेहनत करने की कैपेसिटी के बारे में। मैं एक मध्यम दर्ज़े का academician था जो किसी तरह अपनी दुकान चला लेता था। बस। इससे अधिक मुझमें ऐसा कुछ भी ख़ास नहीं था , स्पेशल नहीं था जो मुझे सोच समझ वाली दुनिया में , या intellectuals , बुद्धिजीवियों की दुनिया में कोई खास जगह दिला सके। उस दुनिया में जगह पाना स्वर्ग में जगह पाने जितना ही कठिन था।
इतना लंबा सफ़र तय करने के बाद अब धीरे धीरे समझ आने लगा की बुद्धिजीवियों की दुनिया में भी कुछ जगहें आपके जन्म, परवरिश से निर्धारित होती थीं। अगर आपके पास कुछ ख़ास योग्यताएं नहीं हैं तो आप योग्य तो हैं पर योग्य- अयोग्य हैं। अंग्रेजी तो अच्छी हो गयी पर एक और स्टेप की क्वालिफिकेशन अभी भी बाकी थी। ये कैसी दिखती थी , मुझे मालूम नहीं था। ऐसा नहीं था की अब मैं हिंदी का पक्षधर होने वाला था। कतई नहीं। मैं तो बहुभाषी व्यक्तित्व का समर्थक होने लगा था।
मगर कुछ एक्स्ट्रा चाहिए था इस दुनिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए। अब तो लगने लगा था की शायद ये मालूम हो पाना भी अब मुश्किल था की वो क्या था जो चाहिए था। अब आगे बढ़ना नामुमकिन सा लगने लगा था जैसे। प्रगतिशीलता के मानक भी अब पहले से अधिक कड़े हो गए थे। मेरा सपने देखने का लाइसेंस, जो शायद कुछ बरस पहले मिला था , अब करीब क़रीब रद्द ही कर दिया गया था। जिस इंसान की रोज़ी रोटी अब तक जिस लाइसेंस पर आधारित हो अचानक उसे कहा जाये की अब उसका अर्थ परिवर्तित हो गया है, और उसका लाइसेंस रद्द हो जायेगा, अगर उसने नए मानकों पर अपने आपको नहीं परिवर्तित किया तो …. . ये सुनकर सुनकर धीरे धीरे मुझे डर सा लगने लगा था। न जाने कब मेरा हुक्का पानी बंद हो जाये , कब इस बुद्धिजीवी दुनिया से आपको निष्काषित कर दिया जायेगा।
पर अब ये करता तो करता कैसे? अपना एक इतिहास तो पीछे छोड़ आया था। वर्तमान तो अभी बन ही रहा था, फिर इस बार कौनसा इतिहास छोड़ कर आता। अगर वर्तमान छोड़ दूँ तो जीने की तो कोई ख्वाहिश ही नहीं बचेगी। धीरे धीरे समझ आया की ये इशारा इतिहास या वर्तमान को छोड़ने क़ी ओर नहीं था , भविष्य को छोड़ने की ओर था । उस सपने को छोड़ने की और इशारा था जो मैंने भूलवश देख लिया था।
एक बात और कहना जरुरी है , ऐसा नहीं था की सब लोग ऐसे ही थे , ऐसा भी नहीं था की मेरे साथी ऐसा जानबूझकर कर रहे थे। हक़ीक़त तो ये थी की वो केवल ऑफिसियल प्रोसीजर फॉलो कर रहे थे। परिणाम उनके नियंत्रण में नहीं था। ये शायद मेरी व्यक्तिगत समस्या थी। उनमें से कुछ शायद सही कहते होंगे मुझमें सुधार के लिए, पर शायद मेरी समझ के कुल्हड़ में छेद हो चला था , कुछ भी ठहरता ही नहीं।
आख़िरकार क्या करता, जीवन का सवाल था। जीवन रहा तो सपना तो और भी बुना सकता था। बस इस सपने का आख़री अहसास भी छोड़ने वाला था , की लगा आखिर क्यों कोने में घुटकर इसे तिलांजलि दूँ। आपको सबको बताकर तो दूँ ताकि कम से कम अपने मन का भार कम रहे मैंने अपना कर्त्तव्य पूरा किया, मुश्किल सपना देखने की कोशिश तो की ही , उसे पाला भी , ज़िंदा नहीं रख पाया तो क्या , मैं कोई भगवान तो नहीं । आख़िरकार आपको बताया तो सही।
वैसे भी नैश तो अब कब के मर चुके, मैं भला उसे क्यों ढोता रहूं। नैश के भूत को आख़री अलविदा।