गुनाह था मेरा,
की मांग बैठी थी ज़िन्दगी से
उधार,
एक छोटा सा घर,
और ख़ुशी सहित
उसमें फलता फूलता,
नन्हा सा
एक परिवार।
फिर क्या था ,
पूरी क़ायनात ही जैसे,
जुट पड़ी थी,
मेरी इस ख्वाहिश की
उधार मांगी
दुनिया को
तितर बितर करने में।
जब देखती हूँ,
रंगीन बेज़बान सुनी पड़ी,
ईंटों की दीवारों को,
या कपड़े से लदी
उन सूखी अलमारियों को,
या सवाल पूछती
किताबों को।
तो सोचती हूँ
क्या मैंने बेईमानी की,
ब्याज़ नहीं चुकाया,
या फिर था चुराया
हिस्सा किसी और का।
पर मैं तो बस चुकाने ही वाली थी,
ज़िन्दगी का उधार,
सूद समेत।
ये क्या इसी की
मुझे मिली है सज़ा?
क्या वो उधार सपना गुनाह था,
या उसे देखने वाली
ये आँखें हैं गुनाहगार,
या ये ज़िन्दगी
अब साहुकार हो गयी।