ख़ूबसूरत जंजाल

मानसी अभी भी विचारों की उधेड़बुन में थी।  आख़िर इस खुबसूरत जंजाल से वो बाहर निकले भी तो कैसे? खुबसूरत, क्योंकि शायद किसी का साथ, किसी का एहसास तथा आपको ये आभास की शायद कोई आपके लिए है, अपने आप में एक बेहद रोमांचक, गुदगुदा और अलग सा भावनात्मक आवेग है। और जंजाल, क्योंकि इस एहसास के साथ जुड़े हैं किसी और के भी एहसास, किसी एक और अपने की यादें और रिश्ते । ये अपनापन भी अजीब चीज़ है ना, कभी आपको किसी मज़बूती की दिलाता है  दूसरे ही पल किसी कमज़ोरी का। अब मैं निकल कर किस तरफ जाऊं? उसे लग रहा था रहा था की इतनी बेचैनी तो शायद उसे तब भी नहीं थी जब उसे अनुज ने छोड़ने का फ़ैसला कर लिया था।

हालाँकि शायद दर्दों की कोई तुलना नहीं होती। हर दर्द अपने आप में एक ख़ास दर्द होता है। जब वो होता है तो लगता है शायद इससे बड़ा दर्द न पहले कभी था और न ही आगे कभी होगा।  हर समय का दर्द एक अलग ही तरह की कसक के लिए होता है।  अनुज के जाने के बाद लगता था की इस दर्द के सामने दुनिया का हर दर्द कम ही होगा।  हर दर्द से लड़ सकती हूँ मैं- मानसी अपने आप को यही बताया करती थी।  जब समीर मेरे जीवन में आया तो लगा की शायद जीवन में फिर वो रंग भर जाएँ जो पहले थे।  पर अगले ही पल दिल और दिमाग को जैसे बिजली का करंट मार गया था। Continue reading

Unlike Intellectual

गलती से एक ख्वाहिश पाल बैठा था जब पीएचडी कर रहा था। कुछ नासमझ फिल्मों को देखकर शायद ये फ़ितूर चढ़ा था। फ़ितूर था नोबेल प्राइज जितने का। इस फ़ितूर में कई भावनाएं जुडी थीं। समाज के लिए कुछ कर गुज़रने की भावना , अपने उन लोगों के लिए कुछ करने का जुनून जो आपकी तरफ़ किन्हीं उम्मीदों से देखते हैं , सोचते हैं की जब ये आगे बढ़ेगा तो हम भी आगे बढ़ेंगे , इसकी तरक्की में हमारी तरक्की है , उनकी आँखों में कई ख्वाबों को उतरते देखना। एक बार एक दोस्त के साथ डी स्कूल (D School/ Delhi School of Economics) गया तो उसने वो गेट दिखाया जो इस इंतज़ार में था की कब कोई भारत में रहने वाला भारतीय d स्कूल का स्कॉलर acadimician जब नोबेल लेकर आएगा और उसे खोलेगा। उस गेट को देखकर शायद मेरा इरादा और भी पक्का हो चला था। ऐसा लगा था की अपने करोड़ों देशवासियों के प्रति शायद ये मेरा नैतिक दायित्व था की मैं मेहनत करूँ। Continue reading