मैं खामोश रहूँ , सुनता रहूँ
बिना कुछ पूछे बस चलता रहूँ ,
दंगाइयों की भीड़ के संग
तो मैं राष्ट्रवादी हूँ।
मैं व्यवस्था को चलाता जाऊं ,
सत्ता को मानता रहूँ,
बिना किसी सवाल और आवाज़
तो मैं राष्ट्रवादी हूँ।
ग़रीब, किसान और मज़दूर
बेरोज़गार, लाचार की आवाज़
सुनकर भी अनसूनी करता रहूं,
तो मैं राष्ट्रवादी हूँ।
आम भारतीय की
आजादी को हरने वालों,
उनकी उम्मीदों को ठगने वालों,
को चुपचाप मानता रहूँ
तो मैं राष्ट्रवादी हूँ।
अपने ही लोगों की मेहनत से बने ,
कानून, नियम और आदर्शों को
टूटते हुए देखता रहुं
खामोश, बेजुबां, बेआवाज़
तो मैं राष्ट्रवादी हूँ।
ज़ात , धर्म के भेदभाव को सहता रहूँ ,
अशिक्षा को मानता रहूँ
पोंगापंथ को मानता रहूँ
तो मैं राष्ट्रवादी हूँ।
एक दिन अचानक पूछ बैठा मैं,
क्या हुआ भाई इतनी ख़ामोशी क्यों है ,
क्यों है इतनी बेचैनी, कुछ तो बोलो।
तभी आवाज़ आई ,
पकड़ो, मारो, छोड़ना मत ,
यही है वो जो अभी बोला
यही वो राष्ट्र विरोधी है।
सुधीर
13 जुलाई 2016