एक और कलंक

“भाई अब ज़माना वो कहाँ रहा जो आज से दस बरस पहले होता था। तब रिश्तों की कोई क़द्र होती थी , कोई लिहाज़ होता था।  अब कौन किसकी लिहाज़ करता है।  सबको अपना जीवन ही तो चाहिए।” राजी आंटी ने संतोष आंटी से कहा।

“ठीक कहा बहिन तुमने।  आज कल के लड़के लड़कियों को देखो। सिर्फ अपना जीवन बनाने में लगे हैं।  औरों की कोई परवाह नहीं। अपना दम्भ इतना अधिक है की उससे आगे तो सूझता ही नहीं।” संतोष  आंटी ने हाँ में हाँ मिलायी।

राजी और संतोष आंटी वैसे तो आंटी नहीं थी।  उनकी उम्र यही कोई चालीस या पैंतालीस बरस के बीच रही होगी  पर दोनों को देखकर नहीं लगता था की उनकी उम्र इतनी है, दोनों देखने में पैंतीस के आस पास की लगती थी। पर भारतीय समाज का ताना बाना खास तौर पर मध्यम वर्ग का ऐसा है की  बुढ़ापा भी अपने आप में एक क्वालिफिकेशन जैसी चीज है।

अगर आपने बुढापेपन का लबादा ओढ़ लिया तो आप कई सामाजिक गतिविधियों पर कमेंट्री के अधिकारी हो जाते हैं।  आपके कई सारे क्रिया कलाप स्वतः ही सामाजिक कानूनों के बाहर चले जाते हैं। यही कारन है की राजी और संतोष आंटी ने भी अपने आप पर आंटीपन का ये लिबास ओढ़ डाला था।

“अब इन दोनों को ही देख लो।  अपने आकाश और अन्विता। वैसे तो काफ़ी सभ्य और सुलझे हुए मालूम पड़ते हैं , न कभी आपस में झगड़ते सुना, न कभी किसी बात की कहा सुनी।  कभी कभी तो मुझे शक़  होता है की इन दोनों का रिश्ता क्या है। पता नहीं आजकल रिश्ते भी क्या हैं। शादीशुदा हैं भी  के नहीं। इन दोनों को तो कभी लड़ते झगड़ते भी नहीं सुना।  कभी बर्तनों की आवाज़ भी नहीं।  शादीशुदा जोड़ा भी कभी ऐसा होता है।  मुझे तो अन्विता को देखकर ही गड़बड़ लगता है।  वो कभी गुस्सा होकर घर से ही नहीं निकलती।” संतोष  आंटी ने चेहरा बनाते हुए कहा।  चेहरे पर ऐसी हैरत थी जैसे जुरासिक पार्क की हक़ीक़त को लेकर असमंजस हो।

खैर राजी आंटी भी इस स्कोरिंग रेस में पीछे कहाँ रहने वाली थीं। तपाक से बोली : “ठीक कहा तुमने। भाई शादी के बाद मैंने तो कभी महेश को चूं भी नहीं करने दी। झगड़े से मुझे कभी डर  नहीं लगा। मैं क्यों डरूँ? आखिर आप पति के साथ हैं ये पता तो चलना चाहिए।  अगर ऐसा न हो तो ये मर्द तो औरत को कभी गंभीरता से ले ही नहीं।  मैंने कभी अपने अधिकारों की लड़ाई नहीं छोड़ी।  पर आजकल के लड़के लडकिया तो तुरंत छोड़ कर चल देते हैं।  भला ये भी कोई बात हुयी।” राजी आंटी बात करते करते लग रहा था जैसे गुस्से में लाल हो गयीं थी।

ये एक तीन मंजिल घर की कहानी थी जो अन्विता ने ख़रीदा था। तीसरी मंजिल  के फ्लैट में मिश्रा जी किरायेदार रहते थे जो  विदेश में अपने बच्चों के पास गए थे गर्मी की छुट्टियों में । फर्स्ट फ्लोर पर अन्विता और आकाश रहते थे। ग्राउंड फ्लोर पर राजी आंटी और संतोष आंटी थीं।  कभी कभी और भी लोग रहते थे, लेकिन अधिकतम तीन महीने के लिए। एक महीने से दोनों यहीं पर थीं।  राजी आंटी जयपुर, राजस्थान  से थीं और संतोष आंटी बठिडा, पंजाब  से।  इस जगह का पता इन्होंने इन्टरनेट से लगाया था और एक महीने पहले यहाँ आ गयीं थी। राजी आंटी और संतोष आंटी को  जैसे ही समय मिलता बैठ जाती पंचायत लगाकर।

“ये दोनों भी न। पता नहीं।  इस लड़की का पति तो इसे संभालकर रख नहीं पाया और चला गया कहीं और। और इस लड़की ने भी इस बात को स्वीकार कर लिया। अरे डंडा देकर रखना चाहिए था। पर नहीं।  जब बात करो तो कहती है  आखिर वो भी तो इंसान है।  कौन समझाए इस लड़की को की इंसान इंसान बाद में है और मर्द पहले।  फिर भला काहे का प्यार और काहे की लव मैरिज जब ऐसे ही छोड़ना था तो। इनसे तो हम ही अच्छे।”

संतोष आंटी भी इस जबरदस्त राजनितिक बहस में कैसे पीछे रहतीं। बातचीत का अगला छोर उन्होंने ऐसे पकड़ा जैसे टूटती पतंग की डोर थाम ली हो।

“इस लड़के को देखो न। वो तो मर्द है। इसने भी अपनी मर्ज़ी से शादी की घरवालों की मर्ज़ी के खिलाफ।और अब एक बच्ची का बाप बनने के बाद छोड़कर बैठ गया।  कहता है उसे मेरे साथ अच्छा ही नहीं लगता तो मैं क्यों ज़बरदस्ती इसके साथ रहूं। अरे भाई शादी की तो घर बसाना भी तो आना चाहिए।”

दोनों महिलाएं अपनी बातों में इतनी मशगूल थीं की उन्हें ये अहसास ही नहीं था की घर के बहार ट्रैफिक का भयकंर शोर था।  दिल्ली भी न विचित्र सा शहर है. ढेरों शोरों के बीच एक अजीब सी लंबी सी ख़ामोशी इस शहर की दीवारों में जैसे समायी है।

ऐसा नहीं था की आकाश और अन्विता को उनकी पीठ पीछे  हो रही गौरव गाथाओं की भनक नहीं होती थी। एक दिन आकाश ने कहा भी अन्विता से की “हमारे यहाँ  आने वाले लोग हमारे रिश्ते में अधिक इंटरेस्टेड हैं बजाय अपना जीवन सँवारने के। याद है पिछली बार राजेश, अंकित और वर्मा अंकल हर समय इन्ही बातों में उलझे रहते थे। बड़ी मुश्किल से वो लोग अपने नए जॉब में सेटल हो पाए।”

“यही तो संघर्ष है न आकाश।  ये ऐसे ही सामाजिक ढांचें से आते हैं ये लोग, जहाँ यही जीवन का मतलब है। इसी लिए  हम इन्हें घर दिलाकर , काम दिलाकर इनकी मदद करते हैं। यही तो हमारे पढ़ाई के मायने हैं न। वैसे भी हमें तो वैसे भी फ़र्क़ नहीं पड़ता की कौन हमारे बारे में क्या सोच रहा है।  हमें तो बस अपना काम करते जाना है।” अन्विता ने  कहा.

“हमारे समाज में कलंकित व्यक्तियों की एक लंबी फेहरिस्त है खास तोर पर औरतों के लिए, पहले पति के मरने पर कलंक, फिर औलाद न होने पर कलंक, फिर पुत्र न होने पर कलंक, फिर परिवार के हिसाब से ठीक ढंग से न निभा पाने पर न कलंक, और  शादी के बाद किसी और मर्द के बारे में तो विचार मात्र से ही कलंक।  कलंकों की इस लिस्ट में हाल ही की एंट्री है तलाकशुदा होने पर कलंक। बड़े शहरों में तो फिर भी ये इतने मायने नहीं रखती पर छोटे शहरों और गावों  में तो औरत  की ज़िन्दगी  इसके बाद नरक हो जाती है।  पुरुषों के लिए भी ये काम घातक नहीं क्योंकि बच्चे होने के बाद पुनर्विवाह का तो आप सोच भी नहीं  सकते। वैसे तो हमारा समाज बहुत उदार और करुणा  भरा है पर तब तक जब तक संपत्ति का झगड़ा न हो।  अगर संपत्ति का सवाल है तो भाड़  में  गयी हमारी करुणा, उदारता , मानववाद।  चूँकि पुरुष ही संपत्ति का अधिकारी है तो पुरुष के लिए भी तलाक के बाद एक नए जीवन  कल्पना असंभव सी ही है क्योंकि संपत्ति जो बाँट जाएगी।” अन्विता लगातार कहे जा रही थी।

आकाश बस एकटक दृष्टि से उसे देखे जा रहा था जैसे की मन ही मन कह रहा हो की मैं तुम्हें समझ सकता हूँ। आकाश ने हामी में गर्दन हिला अन्विता को सीने से चिपका लिया था। 

आकाश और अन्विता दोनों कुछ समय से साथ थे। दोनों की शादी हुयी करीब सात साल पहले पर, अगर भारतीय समाज की भाषा में कहें तो, कामयाब न हो सकीं।  दोनों ने ही अपने परिवार से अलग होकर शादी की थी।  सामाजिक दीवारों को तोड़ भी दें पर कई बार आपसी दीवारें रिश्तों में उनसे भी ऊँची हो जाती हैं जिन्हें लांघ पाना नामुमकिन सा हो जाता है। इन दोनों के साथ भी कुछ ऐसा  ही था। पर अपने तथाकथित  जीवन साथियों से अलग होने के बाद इन्होंने आगे बढ़ने का फ़ैसला लिया था। दोनों इसी तरह इत्तिफ़ाक़न मिल गए और फ़ैसला किया साथ चलने का बिना सामाजिक दीवारों के।

राजी और संतोष आंटी का ये वार्तालाप दुनिया के हर कर्म से ऊपर था। बातें करते करते संतोष आंटी को अचानक कुछ बड़ा सूझा।  वो अपनी भोहें तरेर कर बोलीं: “पता है एक दिन मैं इन लोगों के साथ खाना खा रही थी।  मैंने इनसे पुछा इनके पिछले शादी शुदा जीवन के बारे में।  एक तो इन लोगों को शर्म तो है नहीं, अपनी शादी की बातें कहें भी खोलकर बैठ जाते हैं जैसे हम पहले शादी का फोटो एल्बम दिखाते थे पड़ोसियों को।  ख़ैर, जब मैंने पुछा तो बोले – “आंटी हमें लगता है हमारे पार्टनर्स पोस्ट -मॉडर्न थे। हम दोनों ठहरे थोड़े बैकवर्ड, अभी भी मॉडर्न में ही अटकें हैं शायद। अजीब सा सपना था एक छोटा सा घर बसाने का और वहीँ से दुनिया जीत लेने का सपना।  हम लोग शायद देख ही नहीं पाए की दुनिया और भी है।  इंसान और भी आगे निकल गया शायद।”

“और आंटी”, अन्विता ने कहा था, “अब तो लगता है की हम तो बीच में लटके हैं।  समाज को छोड़ कर आधे मॉडर्न तो बन गए पर पोस्ट-मोडर्निस्ट्स के साथ रहकर कुछ-कुछ वो भी सीख गए।  अब बहोत समय तक  तो समझ ही नहीं आता था की सही क्या है और गलत क्या।  जो पोस्ट-मॉडर्निस्ट हैं उनके साथ एक अच्छी  बात है  की उनके लिए कुछ भी स्थायी नहीं। वे हर स्थायित्व का विरोध करते हैं।  हम तो घर-परिवार में स्थायित्व ढूंढने चले थे। अब भला इन दो इडिओलोजिज़ का मिलान कैसे हो।  किसी एक को तो पीछे हटना ही था। मैंने सोचा मैं ही हट जाऊं। मेरा तो बस इतना सा ही सच है। मैं अभी भी मॉडर्निटी पर ही रुकी हूँ। इन जनाब का सच आप इन्हीं से पूछिये।  मेरा बताना शायद उचित नहीं ”

“मेरा सच थोड़ा अलग है।  मुझे लगा  हमारा रिश्ता हम दोनों को ही पीछे धकेल रहा था।  ऐसे में भला क्यों  किसी  के साथ ज़बरदस्ती की जाये इक रिश्ते में  रहने की। कोई जानवर थोड़े ही हैं की खूंटे से बाँध दिया तो अब छोड़ें कैसे। अब इंसान हैं तो इंसानों की ही तरह का व्यव्हार हमसे अपेक्षित है। बस वही मैंने किया, ग़लत सही पता नहीं। बाकी कहानी का कोई अर्थ नहीं, मैं सिर्फ अपनी सोच जनता हूँ और उसी पर चलने की कोशिश करता हूँ। मैं तो शायद मॉडर्न भी नहीं हुआ अभी तक वही गंवार हूँ गांव का जैसे आया थी दस बरस पहले इस शहर में।”

“अच्छा तो तुम दोनों कैसे मिले”,  उत्सुकतावश संतोष आंटी ने पूछा।

“ अब आंटी वो कहानी फिर कभी।  अब जल्दी से खाना ख़त्म करें , हमें जाना है सामान खरीदने, नहीं तो दुकानें बंद हो जाएँगी।” अन्विता ने कहा और बात को वहीँ विराम दे दिया।  संतोष आंटी बातें  बहुत सारी जानना चाहती थीं पर मन मसोस कर रह गयीं। 

“और बस इसी तरह दोनों ने बात को तोड़ मरोड़कर मुझे बहला फुसला दिया जैसे मैं कुछ समझती नहीं। मैं अब इससे अधिक क्या पूछती?”  संतोष आंटी ने बड़े ही बुझे मन से उत्तर दिया जैसे की ख़ुफ़िया पुलिस अधिकारी के हाथों किसी बड़े अपराध की गुत्थी सुलझते सुलझते रह गयी हो।

तभी ऐसा लगा जैसे बहोत ज़ोर से  आंधी  आयी हो।  दिल्ली में जून के माह में वैसे अब कभी कभी ही धूल भरी आँधियाँ दिखती हैं , मौसम भी इंसानों  के साथ ही जैसे परिवर्तित हो जाते हैं।

तभी बाहर से आवाज़ आयी, “संतोष और राजी आंटी आपने खाना  खा लिया क्या ? भूखे मत सो जायेगा। अन्विता सब्जियां ले आयी है , हम लोग मिलकर बना लेंगे।  बता दीजियेगा।” आकाश था, शायद ऑफिस से लौट रहा था। यही कहते हुए वो सीढियाँ चढ़ गया। तभी तेज हवा का झोंक आया  और धड़ाम से आवाज हुयी जैसे की कुछ सामान गिरा हो। आकाश बाहर दौड़ा देखने की क्या गिरा।

ये एक बोर्ड था जो इसी घर के बाहर टंगा था और आंधी से उड़ गया था , जिस पर लिखा था “अन्विता-आकाश तलाकशुदा महिला-पुरुष सहायता केंद्र” और नीचे एक छोटी लाइन में लिखा था “अधिकतम ठहरने की अवधि – तीन माह।”

सुधीर

सितम्बर 18, 2016

One thought on “एक और कलंक

Leave a comment