एक और कलंक

“भाई अब ज़माना वो कहाँ रहा जो आज से दस बरस पहले होता था। तब रिश्तों की कोई क़द्र होती थी , कोई लिहाज़ होता था।  अब कौन किसकी लिहाज़ करता है।  सबको अपना जीवन ही तो चाहिए।” राजी आंटी ने संतोष आंटी से कहा।

“ठीक कहा बहिन तुमने।  आज कल के लड़के लड़कियों को देखो। सिर्फ अपना जीवन बनाने में लगे हैं।  औरों की कोई परवाह नहीं। अपना दम्भ इतना अधिक है की उससे आगे तो सूझता ही नहीं।” संतोष  आंटी ने हाँ में हाँ मिलायी।

राजी और संतोष आंटी वैसे तो आंटी नहीं थी।  उनकी उम्र यही कोई चालीस या पैंतालीस बरस के बीच रही होगी  पर दोनों को देखकर नहीं लगता था की उनकी उम्र इतनी है, दोनों देखने में पैंतीस के आस पास की लगती थी। पर भारतीय समाज का ताना बाना खास तौर पर मध्यम वर्ग का ऐसा है की  बुढ़ापा भी अपने आप में एक क्वालिफिकेशन जैसी चीज है। Continue reading

काश

काश ज़िन्दगी ने कुछ लम्हे और दिए होते,

मरने को थोड़ा वक़्त और मिल गया होता।

काश वक़्त ने कुछ आस और दी होती,

जीने को कुछ बहाना और मिल गया होता।