एक कविता

कहीं पर अटकी सी एक कविता
कहीं पर लटकी सी एक कविता

विचार हैं ढेर सारे पर आते नहीं ,
धुनें है पर बजती नहीं
शाम है , सुबह है ,धुप भी है , छाँव भी ,
खुशियां हैं पर खिलती नहीं.
मगर फिर भी है ,
कुछ कहने के इंतज़ार में
रुकी रुकी सी एक कविता।

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