खामोश रहता हूँ बोलता नहीं,
सहमा सा रहता हूँ मैं ।

डर नहीं किसी का मगर
हर पल है आशंका सी।
सूखा है मन ,
बेभाव बेभाषा
बिना कविता बिना सुर।
चल रही है सांस मगर
बिछड़ा सा हूँ
इस बेमतलब ज़िन्दगी से मैं ।
आहिस्ता आहिस्ता जीता नहीं,
बस पल पल किश्तों में
मरता ही तो हूँ मैं।
सोचे चाहे जो भी तुम,
की शायद लिख रहा हूँ ये
तुम्हारी दया
या फिर प्रसिद्धि
की खातिर ।
झूठा या सच
तुम्हारी पसन्द न पसंद
जो भी सही
मगर कम से कम
लिखता तो हूँ मैं।