सवाल

अपने आप को ढूढता मैं,
किसी देश के किसी दूर कोने में,
किसी रेलवे स्टेशन, किसी बस स्टॉप,
किसी पार्क, किसी सड़क के कोने में,
अपनी निशानी ढूंढता हूं  मैं,
मैं हूं तो सही, जिंदा भी हूँ,
सांस भी बाकी है शायद उम्र भी,
मगर क्यों है,
इन सबका अर्थ ढूंढता हूं मैं,
अगर ये सब बेमानी हैं तो
क्यों इंतनी तवज्जो,
क्यों इतना हल्ला,
क्यों इतने माने हैं जीवन के,
समाज के, व्यक्ति के
बचपन के, जवानी के, वयस्कता के,
इन बेसिर पैर, बेमानी
उलजुलूल सवालों से उलझता
आखिर क्यों ही ये सवाल पूछता हूँ मैं.

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