दादरी, ग्रामीण समरसता और अन्य सवाल

क्या सवाल केवल दादरी का ही है? क्या मुद्दा सिर्फ क्या किसी ने खाया और कैसे किसी ने उसे अपनी सांस्कृतिक पहचान मानकर दंगा किया, ये है? या इन सवालों के कुछ और भी माने हैं। कैसी विडम्बना है की एक तरफ गावों में बसने वाला एक बड़ा भारतीय समाज ये शिकायत करता है की देश में गावों के साथ भेद भाव किया जाता है। विकास को लेकर बनायीं जाने वाली नीतियां हों या फिर अत्याधुनिक तकनीक का प्रयोग , इन सब का केंद्र शहर ही होते हैं, गावं नहीं। साथ ही साथ ये भी कहा जाता है की गावों में इस देश की आत्मा निवास करती है। ये आत्मा सांस्कृतिक भी है , आर्थिक भी, और राजनैतिक भी। अन्य शब्दों में गावों के साथ इन सब ऐतिहासिक विशेषताओं के बावजूद भेदभाव होता है। आखिर क्यों ?

देश का एक बड़ा पढ़ा लिखा , बुद्धिजीवी तबका इस बहस से वाक़िफ़ है की स्वतन्त्रता के बाद विकास और राजनीती का केंद्र क्या हों : गावं या शहर ? जहाँ एक और देश के वो नेता और बुद्धिजीवी थे (अम्बेडकर और नेहरू) भारत में सामाजिक और आर्थिक स्तर पर आमूल चूल परिवर्तन चाहते थे वहीँ दूसरी और ऐसे नेता भी थे जो भारत का विकास उसके सांस्कृतिक स्वरूप के साथ चाहते थे। उनके अनुसार गावं भारत की मिली जुली संस्कृति तथा स्वावलम्बी अर्थव्यवस्था का प्रतिक थे। हम सभी जानते हैं की इस दृष्टिकोण के पक्षधर गांधी जी थे। देश के एक बड़े तबके ने गांधी जी के अनेकों आंदोलनों में बड़ी संख्या में शिरकत कर ये तो बता ही दिया था की जान मानस गांधी जी के विचारों के काफी करीब था। यद्यपि अन्य नेता और बुद्धिजीवी गांधी जी से इत्तिफ़ाक़ नहीं रखते थे।

वर्तमान समय में विकास की धारा को दी जाने वाली चुनौती तथा जल, जंगल और ज़मीन के लिए होने वाले आंदोलन इस बात का प्रतिक हैं की ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी गावों को जीवन का आधार बनाये रखने तथा विकास की धरा को उनकी तरफ मोड़ने की कवायद निरंतर जारी है। ऐसे में दादरी या फिर मुजफ्फरनगर या फिर पलवल या फिर खाप पंचायत से चलने वाले गावं, जैसी घटनाएँ क्या हमें ये सोचने पर मजबूर नहीं करतीं की हम गावों में किस सांस्कृतिक समरसता की बात करते आये हैं ? क्या ये समरसता, मिली जुली संस्कृति सब एक छलावा है , ऐतिहासिक झूठ है ? क्या गावों में ऐसा कोई माहोल नहीं था जिसको लेकर गांधीवादी विचारधारा उन्हें विकास का केंद्र बनाना चाहती थी ? करीब एक दशक पहले तक कहा जाता था की भारत में धार्मिक दंगों की प्रकृति शहरी है ग्रामीण नहीं। गावों में धार्मिक उन्माद का वैसा नंगा नाच मिलता था जैसा शहरों में। पर अब धीरे धीरे स्थिति बदल रही है। शहरों में धार्मिक उन्माद के बाद लोग एक कोने से दूसरे कोने में चले जाते थे। पर गावों में ऐसे उन्माद के बाद केवल एक ही रास्ता बचता है , वो है पलायन। कारन साफ़ है , चूँकि बहुमत ने अपना पक्ष बता दिया है इसलिए अब वहां किसके भरोसे रहा जाये। पुलिस पर तो भरोसा किया नहीं जा सकता।

पलायन का यही विभ्त्स्व स्वरूप अब धीरे धीरे गावों प्रति उस सोच को सही साबित कर रहा है जिसक पक्षधर भारत के विकास के कर्णधार रहे हैं। अफसोसजनक की इन सब घटनाओं के बाद भी ग्रामीण परिवेश से , या ग्रामीण राजनितिक नेतृत्व से कोई पहल नहीं दिखाई पड़ती जो इन सब घटनाओं को रोकने के लिए हो। गावों के भीतर भी इन सब घटनाओं को मौन स्वीकृति जैसा माहोल रहता है या फिर ऐसी घटनाओं के कारणों को सही बताने कोशिश। ऐसे में धीरे धीरे गावं एक बड़े , खास तोर पर अल्पसंख्यक तबके के लिए , धीरे धीरे रहने लायक नहीं हैं। पलायन का एक मुख्या कारन ये भी है।

ऐसे पलायन को कुछ क्षेत्रों में रोकने के अधिक गंभीर प्रयास भी नहीं किये गए हैं। कारन साफ़ है, पलायन करती जनसँख्या शहरों में चल रहे कंस्ट्रक्शन वर्क , सिक्योरिटी एजेंसीज , सड़कों के किनारे लगते ढाबों , आफिस में मददगारों (पेओन), या घरों में काम करने के लिए हेल्प इत्यादि जरूरतें पूरी करता है। तो बहाल इसे सुनियोजित ढंग से रोकने की क्या आवश्यकता। अन्य शब्दों में , आर्थिक लॉजिक पलायन के पक्ष में है कारण चाहे जो हो।

दूसरी और गावों में रहने वाले लोगों ने भी धीरे धीरे शहरों की और देखना शुरू किया है अपनी समस्यायों के समाधान के लिए. आपसी सूझ बुझ आगे बढ़ने निर्धारित कोई वाद विवाद गावों में लुप्त प्राय है। ऐसे में शहर केंद्रित विकास की विचारधारा का धीरे धीरे फैलाव तथा गावों में बढ़ते सामाजिक तनाव जैसी घटनाएँ होनी लाज़मी हैं। आशा है दादरी के लोग इससे कुछ शुरुआत करें। सवाल सरकारों, पुलिस, और राजनितिक दलों का नहीं है। सवाल अपने अस्तित्व का है। क्या इस तरह की घटनाएँ गावों के अस्तित्व और अस्मिता को बनाएंगी समाप्त करेंगी ? सवाल ये है।

3 thoughts on “दादरी, ग्रामीण समरसता और अन्य सवाल

  1. प्रिय सर
    सबसे पहले में आपके इस विचारोत्तेजक लेख के लिए धन्यबाद देता हूँ. आपके द्वारा उठाये गए सवालों के जबाब ढूंढ पाना इतना भी आसान नहीं हैं. हाँ, मैं इतना जरूर कहना चाहूंगा की दादरी में जिस तरह से मानवता को कुचला गया ये कोई नयी घटना नहीं हैं. बस नयापन इतना हैं की आधुनिक संचार साधनो की बजह से ये घटनाये अब मुख्य धारा मिडिया चैनलों के बिषय बनती जा रहे हैं और देश के जन मानस तक ये ख़बरें पहुँच पा रही हैं, हालाँकि इस सबसे भी कुछ राजनितिक दलों की खूब रोटियां सिक रही हैं. दादरी की घटना भी सदियों से देश के अल्पसंख्यको पर हो रहे अमानवीय अत्याचारों की एक बानगी है. इस देश के गॉंव ही नहीं बल्कि पूरी की पूरी सामाजिक व्यवस्था ही कभी सामाजिक समरसता की घोतक नहीं रही. समाज के कुछ दबे कुचले तबके जब तक चुपचाप एक पॉपुलर कल्चर की अमानवीय परम्पराओं को ढोते रहे तथा अत्याचारों को सहते रहे तब तक सामाजिक समरसता बनी रही, जैसे ही इन लोगों ने अपना हक़ माँगा, रहने, खाने पिने और पहनने की आजादी मांगी तो सामाजिक समरसता की जड़ें हिलने लगी. ये वोखलाये और मदांध लोग नए नहीं हैं. मैं जब छोटा था तो देखता था की जब भी दलित बस्तियों मैं रहने वाले लोग बेगारी या उनकी महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाने की कोसिस करते तो उनके घरों को जला दिया जाता, उनके खिलाफ और भी क्रूरताओं का दौर शुरू हो जाता. मेरे दादाजी बताते थे की कइयों को तो ईंट के भट्टों और कोल्हू की भट्टियों मैं झोंककर जला दिया गया था. कई महिलाओं को उपलों के बिटोरों में रखकर आग लगा दी गई. ये सब कुछ गॉंव के परमेस्वर कहे जाने वाले पंचों की देख रेख में ही होता था. न कोई पुलिस न कोई मीडिया बस एक छत्र जंगल राज. परिणामस्वरूप मेरे गॉंव से ९०% प्रितिशत से भी जयादा दलितों की आवादी ने शहरों की तरफ पलायन किया और कभी वापस नहीं आये; शायद शहरों ने उन्हें कम घुटन दी होगी. ऐसे न जाने कितने वाकये हैं और न जाने कितने अभी भी जारी हैं.
    सवाल ये है की आज हम जिन मानवीय संवेदनाओ की बात कर रहे है वो तो पहले से ही नहीं है. मेरा मानना ये है कि इस जातिवादी, सम्प्रदायक तथा सामंतवादी व्यवस्था और मानसिकता पर ठीक से प्रहार ही नहीं किया गया, न तो हमारे महात्माओं ने और न ही आधुनिक शिक्षा पद्धति ने. जिन्होंने करने कि कोशिस भी की उनको देश द्रोही, धर्म विरोधी, जातिवादी और न जाने क्या क्या कह कर नकार दिया गया. इस देश की शिक्षा पद्धति नौजवानो को वो सब बताने में नाकाम रही जिससे की वो सही और गलत पर सवाल कर पाते और मानवीय मूल्यों के प्रति संवेदनशील हो पाते. आज भी इस देश की ३०% से भी ज्यादा प्रारंभिक से लेकर माध्यमिक शिक्षा पर आरएसएस संचालित विद्या मंदिरों का कब्ज़ा है जिनमे क्या पढ़ाया जाता है मैं भलीभांति परिचित हूँ. संस्कृति और मूल्यों के नाम पर एक ऐसी सोच का बीज बो दिया जाता है जो जिंदगी भर सही गलत को पहचान ही नहीं पाता. वैसे दूसरे माध्यमों का भी कुछ ज्यादा अच्छा हाल नहीं है. मुझे कुम्भ मेले का वो द्रस्य याद आता है; घमंड और नशे में धुत नंग धडंग शाधुओं की टोलियां, और अंधविस्वास एवं अंध श्रद्धा में डूबीं महिलये और जवान लड़कियां इन बाबाओं के लिंगों पर तिलक लगाती हैं और चूमती हैं. कितनी दोगली मानसिकता का शिकार है इस देश की आवादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा जो, जो पोर्न देखने पर संस्कृति की दुहाई दे कर चिल्लाता है, लड़कियों के छोटे कपड़े या प्रेम प्रसंग पर तुगलकी फरमान जारी कर देता है पर धर्म के नाम पर खुले आम हो रही अश्लीलता पर कुछ नहीं बोलता. ऐसी ही कुपोषित और कुंठित मानसिकता के परिणाम है दादरी, भगाना कांड, खैरलांजी और अनगिनत घटनाये. मुझे लगता है की सिर्फ कानून बना देने से ही या मूकदर्शक बनकर देखने मात्र से बात बनने वाली नहीं है, इस देश में आमूलचूल व्यवस्था परिवर्तनों के प्रयाशों की संभावनाओं को तलासने की जरुरत है.
    Thanks!

    • Dear Govardhan,

      Thanks for the message. Precisely this is the debate I want to initiate. Whether there was/is a cultural harmony in villages or not? What kind of debate we need to carry forward? We have seen how difficult it has become to manage cities in India. Moving away from villages will not be feasible solution in the near future. Therefore, we need to work on villages themselves. The question is how to do that?

      • Indian village a full of paradox that was/is deemed as a locus of social harmony but the fact is diametrically different as cited by Gobardhan. Whether modernity, technology has brought it or it was existed before but stimulated by these factors is a matter of debate. Remember B R Ambedkar statement ‘village hub of localism den of communalism’- historically this was along the line of caste now emerging along the line of ‘community’ as well. The ultra-right is really a challenge for plurality and diversity in India.

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