वो तार

World Mental Health Day 2015

World Mental Health Day 2015

अन्वेष पिछले तीन दिन से आई सी यु में भर्ती था,  ज़िन्दगी और मौत के बीच झूलता हुआ। बिना झूले के बिस्तर पर पड़ा हुआ। वेंटीलेटर भी लगा था जिससे सांस आ जा रही थी।  या कहें धीरे धीरे जा रही थी।  पता नहीं ज़िन्दगी मौत के पीछे थी या मौत ज़िन्दगी के पीछे, पर हाँ एक रेस जरूर थी इन दोनों के बीच।

छत्तीस  साल का अन्वेष एक सॉफ्टवेयर कंपनी में रीजनल हेड की पोस्ट पर था।  तनख्वाह तो अच्छी खासी थी ही साथ ही कंपनी में उसकी रिस्पेक्ट भी काफी थी। उसने दिल्ली के अमीरों वाले इलाक़े वसंत विहार में फ्लैट खरीद रखा था। ये ऐसा इलाका था जहाँ फ्लैट किराये पर लेकर रहना अमीरियत की निशानी है तो खरीदना तो पता नहीं क्या होगी।  दो बड़ी सेडान सेगमेंट की गाड़ियां भी थीं। शिरीन से शादी को करीब दो साल हुए थे और एक बच्चा भी था।  सब कुछ अच्छा , ख़ुशहाल।  दिखने में कोई परेशानी नहीं।

पर फिर अचानक क्या हुआ की इस खुशहाल ज़िन्दगी से इस झूले पर!

उस रात पति पत्नी में भयंकर झगड़ा हुआ था। वैसे ये कुछ नया नहीं था अन्य पति पत्नियों की ही तरह।  पर आज कुछ ज़्यादा ही हो गया जब शिरीन ने उससे गुस्से में कहा “अब तुमने इस आफत को भी मेरे गले डाल दिया, नहीं तो मैं कब की तुम्हें छोड़कर चली गयी होती ”  .

ये सुनकर उसे बहुत दुःख हुआ था।  शिरीन और वो दोनों एक दूसरे को करीब सात साल से जानते थे।  फिर उन्होंने शादी की थी। शादी से पहले सब ठीक ठाक था। शादी से पहले शिरीन एक सीधी साधी पत्नी, जो घर सम्हाले और पति और बच्चे में अपना सुख देखे, की तरह तरह जीवन बिताना चाहती थी। इसीलिए उसने शादी होते ही नौकरी छोड़ दी, अन्वेष के लाख समझने पर भी की “अपनी उस मेहनत और समय के बारे में सोचो जो तुमने इतने साल इस पढाई पर लगाये।  और अब तुम अपना करियर ऐसे छोड़ रही हो।”

पर शादी के बाद धीरे धीरे शिरीन को लगने लगा की शायद वो इस तरह घर पर नहीं बैठ पायेगी।  और धीरे धीरे उसने इसके लिए अन्वेष को जिम्मेद्दार ठहरना शुरू किया। इंतहा तो तब हुयी जब बच्चा भी इसकी चपेट में आने लगा।  बस यही अन्वेष का दिमाग सम्हाल नहीं पाया और उस रात उसने शायद शराब ज़्यादा पि ली थी  और घर की छत  पर चला आया।

“हाँ यही तो हुआ था और फिर शायद मैं छत से गिर पड़ा। ” अन्वेष के दिमाग आई सी यु में लेटे लेटे कहा।  शायद मुझे गहरी चोट लगी थी और सिर से खून निकल आया था। डॉक्टर्स को अन्वेष के दिमाग ने कहते सुना था की उसके दिमाग में चोट थी और बचना मुश्किल।  पर वो कोशिश करेंगे।

मुझे बचाने की।  पर मुझे क्या हुआ।  भला मेरे ही बल बुते पर तो अन्वेष इतनी दूर चला आया।  गावं से शहर , शहर से पढाई, फिर नौकरी फिर माता पिता के खिलाफ शादी और ये आलिशान रहन सहन।  मैं क्या इतना कमजोर हूँ की इतनी जल्दी हार मान  जाऊंगा।

पता नहीं ये डॉक्टर भी किस किस चीज़ का इलाज करने लगने हैं। समस्या कुछ और थी। वो तार जो मुझे दिल से जोड़ती थी अब टूट गयी थी। मैं तो ज़िंदा हूँ पर दिल, वो मेरे बिना कुछ नहीं बोलता।  और अगर बोलता भी होगा तो मुझे पता नहीं। उसी को चलाये रखने के लिए तो इन्होने ये मशीन लगा रखी  है।  बेचारा दिल। अन्वेष के दिमाग ने सोचा।

कुछ ही देर बाद पर के बिस्तर पर भी एक और औरत को लाया गया था।  करीब पच्चीस से तीस  साल के बीच रही होगी।  उसने शायद खुद को गोली मार  ली थी।  ‘ओह , वहीँ जहाँ मैं रहता हूँ। ‘

“अगर मुझे इस तरह की चोट लग जाए तो ये लोग ऐसा क्यों सोचते हैं की मैं बिगड़ गया हूँ।  मैं तो ज़िंदा हूँ।  भाई, उस तार को ठीक करो। पर मेरी कोई सुनता ही नहीं। “

“डॉक्टर्स तो हमेशा दिमाग के अंदर समस्या ढूंढते हैं और दार्शनिक माइंड और बॉडी के सम्बन्ध को समझना चाहते हैं।  धर्म में आत्मा, दिमाग और अन्य तत्वों को समझने की कोशिश की गयी है।  पर माइंड और हार्ट की रिलेशनशिप को कोई नहीं देखना चाहता।  उस तार को कोई नहीं देखना चाहता  जिससे ज़िन्दगी बनती है। “

“हाँ अब समझा।  जिस चीज़ से वो तार बनता है उसका सामान तो इनके पास है ही नहीं। वो तार बनता है पांच सामानों से।”

अन्वेष का दिमाग लगातार अपने आस पास देख रहा था।  कुछ ही समय में आई सी यू के हॉल में तीन लोग ऐसे थे जिनका दिमाग, डॉक्टर्स के अनुसार या तो काम करना बंद कर चूका था, या कम  काम कर रहा था। किसी के दिमाग में थक्का जमा था तो किसी में कुछ और जमा था।

अन्वेष का दिमाग लगातार अपने आप से ही बातें कर रहा था।  एम्स का ये भरा हुआ आई सी यू  उसे एकदम बेचैन किये हुए था।

उसने सोचा की जिस तरह से यहाँ लोग आ रहे हैं , ऐसा लगता है अपने शौक से आ  रहे हैं।  भला ये भी कोई जगह है आने की।  इंसान जो ज़िंदा नहीं है उसे भी झुलाये रखते हैं।  पर शायद इसे ही उम्मीद कहते हैं।

अब इन्हें कौन समझाए की जिस सामान को,जैसे लड़ाई झगड़ा , विद्वेष, कॉम्पिटिशन , असुरक्षा , डर इत्यादि , धीरे धीरे दिमाग से पिघल जाना चाहिए, या दिल वाले तार से बहार निकल जाना चाहिए, आजकल वो मुझ तक पहुँचता तो है पर वापस नहीं जाता।

जब दिल वाले तार से वो दिमाग तक तो पहुँचता है पर वापस नहीं निकलता , जैसे शरीर से भोजन के अवशेष  निकल जाते है, तो मुझे परेशानी होने लगती है और मैं कोशिश करता हूँ किसी तरह उसे दिल तक पहुँचाने की। जिन्हें स्ट्रेस सिचुएशन कहते हैं, आखिर दिल अधिक सशक्त है ऐसी समस्यायों को सुलझाने में, मुझसे कहीं ज्यादा ।  मेरे और दिल की इसी कश्मकश में, इसी मशक्कत में कमबख्त तार कई बार टूट जाता है।

अब अन्वेष को ही देखिये।  शिरीन और उसके बीच का झगड़ा धीरे धीरे अन्वेष के दिल से मुझ तक पहुँचने लगा।  पहले तो वो पिघल कर निकल जाता था।  पर कुछ समय से अन्वेष उसे मुझमें ही छोड़ देता।  ऑफिस में , पार्टी में , ड्राइविंग करते समय , गाना सुनते समय , नहाते समय, खाना कहते समय और हर वक़्त।  मैंने कई बार समझाया भी की इसे वापस दिल के पास भेज दो मेरे पास इतनी जगह नहीं।

पर नहीं अन्वेष नहीं माना।  अब मैं कब तक सम्हालता।  एक दिन जबरदस्ती दिल के पास भेज रहा था की तार टूट गया। भावना, प्यार, भरोसा, संतोष और आस्था के बने इस तार में अगर इनमें से एक भी चीज कम  होना शुरू हुयी तो समझिए तार कमजोर होना शुरू।

पर क्या डॉक्टर पूरी तरह गलत थे।  नहीं।  इस तार के बिना भी चल जाता है, ठीक वैसे ही जैसे दिल का बाई पास ऑपरेशन होता है वैसे ही।  अगर आपको ऐसे साथी मिलें जो इन पाँचों  में से किसी एक भी तत्त्व को आपको भरपूर देते रहें और मुझमें जमा सामान को दिल तक पहुंचाएं या फिर बाहर निकालने  का काम करें, तो वो तार नहीं टूटता।

शिरीन और अन्वेष की शादी के बाद दोनों के दोस्त तो थे ही नहीं।  परिवार और रिश्तेदार वैसे भी छोड़ चुके थे। इन दोनों ने भी परवाह नहीं की क्योंकि आखिर सब कुछ तो था इनके  पास तो किसी और की क्या ज़रूरत । तो बाई पास सर्जरी कैसे हो दिमाग की।

तभी अन्वेष के दिमाग ने देखा , शिरीन आकर अन्वेष के बगल में बैठ गयी। थी।  चेहरा उतरा हुआ तो था पर व्यवस्थित भी था। अन्नू शायद घर पर ही होगा।  शिरीन को कितना दुःख हो रहा होगा। कितनी परेशान होगी वो।  मुझे शायद ऐसा नहीं करना चाहिए था।

तभी शिरीन ने अपने पर्स से स्मार्ट फ़ोन निकाला  और अन्वेष के चेहरे के बग़ल में आकर फोटो क्लिक करने लगी।

अन्वेष का दिमाग घबराया एक पल के लिए।  क्या कर रही है ये ?

ओह, सेल्फ़ी ले रही है।  तभी शिरीन ने फ़ोन मिलाया और किसी को कहा :

“ज़रा देखो दो अन्वेष कैसा लग रहा है हॉस्पिटल में बिना दिमाग के।  मैंने तुम्हें व्हाट्स एप्प पर सेल्फ़ी भेजी है।  फॉरवर्ड भी कर देना दोस्तों को। ”

मुझे लगा की शायद अब उस तार की आखरी उम्मीद भी जा चुकी थी।  मुझे लग रहा था जैसे सचमुच मैं डूब रहा हूँ।  आँखों   के आगे अँधेरा छा रहा था।

तभी बगल में लगे पल्स और हार्ट मॉनिटर पर अब तक आ रही आवाज़ों के साथ ऊँची नीची होती लाल लाइन सीधी हो गयी।  नर्स और डॉक्टर दौड़े पर तब तक तार पूरी तरह टूटकर बिखर चूका था।

तरक्की की आरज़ू

दिल्ली शहर के बदरपुर इलाके में दंगे भड़क उठे थे।  कर्फ्यू लगा था। यूँ तो इसकी ख़ामोशी शहर की गलियों  में दिखती है पर उसकी आवाज़ दूर तक सुनाई देती है।   इस बार इसका निशाना पलवल के पास एक गांव में रहने  अख़लाक़ का घर था।

अखलाक़ की जैसे दुनिया ही उजड़ गयी थी।  शहर में रहने वाला उसका इकलौता लड़का तनवीर दंगाईयों की भेंट चढ़ गया था । पता चला था की एक भीड़ ने उसे पीटकर जला दिया था जब वो नमाज़ के बाद मस्जिद से घर लौट  रहा था।  गावं के चौधरी रवि साहेब का लड़का भी मारा गया था।

दोनों की मोत अस्पताल में हुयी क्योंकि अस्पताल ने बिना पैसे जमा किये आइ सी यू में भर्ती करने से मना कर दिया था।  साथ ही किसी जानकार की उपस्थिति भी आवश्यक थी क्योंकि पुलिस और दंगों का मामला  था।  इसी सब में दोनों ने दम  तोड़ दिया था। आखिर जानकार कौन  होता।  इस  आधुनिक फ्लैट्स वाली कॉलोनी में आये हुए बस एक महीना ही तो हुआ था।

किसी उजड़े हुए बाग़ जैसे अपने घर घर के आँगन में गावं के लोगों के बीच बैठा अखलाक़ सोच रहा था।  उसे याद आ रहा था  वो दिन जब उसने नूर से ज़िद की थी तनवीर को शहर भेजने की।

अखलाक़ को आज भी याद था वो समय जब वो और नूर सोचा करते थे और बेहतर जीवन के बारे में, तरक्की के बारे में । इसी बेहतर जीवन की तलाश में, जिसका अर्थ किसी को नहीं मालूम होता सिवाय उसके जो उसे पाना चाहता है , उन दोनों  ने इकलौते बेटे को शहर पढ़ने के लिए भेजने का फैसला किया।  हालाँकि ये इतना आसान नहीं था।  दोनों मियां बीवी के बीच काफी बात हुयी थी इस बारे में।  अखलाक़ जहाँ शहर के पक्ष में  नूर उसके खिलाफ. अखलाक़ की आरज़ू थी की वो अपने बेटे को आगे बढ़ते हुए देखे। और आगे बढ़ने का अब नए भारत में अर्थ था शहर। आखिर पंडित नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक , सब तो शहरों को अत्याधुनिक बनाने में लगे थे।  गावं में क्या रखा है।

अखलाक़ दरजी का काम करता था गावं में।  थोड़ी सी ज़मीन  भी थी जिससे साल भर का गुज़ारे  लायक अनाज भी हो जाता था।  कुछ बच जाता था जिसे पास की अनाज मंडी में बेचकर अखलाक़ को  कुछ और कमाई भी हो जाती थी।  अखलाक़ की दर्ज़ी की दुकान भी अच्छी चल रही थी।  उसकी पत्नी नूर भी अच्छी कढ़ाई कर लेती थी। तनवीर उनकी इकलोती संतान था।  बड़े ही नाजों से पला था अखलाक़ और नूर ने उसे। कुल मिलाकर एक सुकून की ज़िन्दगी थी अखलाक़ की।पर कई बार सुकून इंसान को रास नहीं आता।  उसकी प्रवर्ति है कुछ नया कुछ बेहतर करने की , फिर परिणाम चाहे कुछ भी हो।

गावं में आखिर रखा क्या  है सिवाय रोजाना की सिरदर्दी के।  कभी किसी से कोई गुरेज़ तो कभी कोई नाराज़।  काम तो अधिकतर उधार में चलता था।  कुछ एक घर जिनका कोई परिवार सदस्य नौकरी में था , या  शहर में काम करता था , वही समय से पैसा  नहीं  कहता था, ‘अरे अखलाक़ भाई कहीं भाग थोड़े ही जायेंगे , बस अगली फसल आ जाने दीजिये , आपका हिसाब चुकता कर देंगे ‘ . अखलाक़ जानते थे की पैसा तो आ ही जायेगा पर अब की जरुरत का क्या ? दूसरा न कोई सुविधा है।  शहरों में तो  बहुत सारे हॉस्पिटल हैं सुना है।

गावों में लड़के केवल इधर उधर घूमते हैं, दूसरों के घरों की बातें करते हैं, या फिर माता पिता उनकी शादी कर जीवन के अगले पड़ाव पर उन्हें धकेल देते हैं।  बस इन्हीं में तो सिमटी है यहाँ की ज़िन्दगी।  शहरों में काम से काम लोगों के पास काम तो होता है। यही सोचकर दोनों ने तनवीर को शहर भेजने की सोची थी।

अखलाक़ नूर को यही सब समझाने में लगा था।  नूर थोड़ी चिंतित थी इस लिए नहीं की तनवीर के जाने से उसे कोई खौफ था।  उसे  लग रहा था की गावं इतनी बुरी जगह नहीं है। ‘आखिर हमारे यहाँ अपने लोग हैं।  हर सुख दुःख में वे हमारे साथ खड़े रहते हैं।  उस अनजान शहर में क्या है ऐसा।  रोजाना सुबह बस जाती है उससे चला जायेगा और शाम को  लौट आएगा।  आखिर पढ़ना ही तो है , वहां रहने की क्या जरुरत है।  आखिर किसी मुसीबत में अपने लोगों की ही तो जरुरत पड़ती है।  अकेला पैसा ही तो काम नहीं आता।”

” याद है  जब रवि भाई साहेब शहर में बीमार हो गए थे तो मुहम्मद चाचा पैसा पहुंचकर आये थे।  रामु चाचा ने कितनी बार अहमद की पढाई के लिए पैसे भिजवाये।  ये जानते हुए भी की अहमद के अब्बा वो पैसा लोटा नहीं पाएंगे।  हमें ही देख लो।  उस दिन जब तुमने सुरजीत भैया से बात की थी तनवीर की पढाई के लिए तो उन्होंने चरण कहा था कोई ज़रूरत हो पैसे की तो तुरंत बताना। यहाँ अगर कुछ समस्याएं हैं तो कुछ अच्छी बातें भी तो हैं।  शहर में कौन है अपना जो मदद करेगा ज़रूरत के वक़्त ।”

आज से कुछ बरस बाद तनवीर तो वहीँ रहना चाहेगा।  हम वहां जाकर क्या करेंगे।  न वहां काम होगा न मन लगेगा।  यहाँ दूसरों की बातें ही सही पर बात तो हैं , दोस्त और इंसान तो है।  शहर में तो सब व्यस्त हैं।  वहां कहाँ कोई किसी के पास केवल बात करने या फिर बैठने के लिए मिलता है।  उसके लिए भी तो बहाना चाहिए।  भला इंसान को इंसान के लिए बहाना चाहिए क्या ? क्या इंसान होना ही काफी नहीं ? यहाँ सब सबके लिए है।  जिसके लिए कोई नहीं उसके लिए भी कोई है।

“और उन भेदभावों का क्या जो हम गावं में देखते हैं।  कई हिन्दू घर तो हमारे यहाँ का खाते  भी तो नहीं क्योंकि हम उनके हम मज़हब नहीं हैं।  आधा गावं  तो हमें नीची नज़र से देखता है। तुम तो घर में रहती हो तुम्हें क्या पता। ” अखलाक़ ने तर्क दिया।

“इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है। हम भी तो आधे गावं के यहाँ नहीं जाते।  जो लोग हमारे यहाँ नहीं आते वो भी तो तुम्हारे यहाँ कपडा सिलवाने  आते हैं। तुम तो कितनों के यहाँ खुद ही नाप लेने या कपडा सिलने जाते हो। रामप्रसाद ब्राह्मण के यहाँ लड़की की शादी में तुमने ही तो सिलाई की थी और मैंने कढ़ाई।  उनके यहाँ हम कभी नहीं गए पर रोज़ न्योता आता था।  बाद में भी मिठाई पहुंचे थी उन्होंने।  अखलाक़ मियां सबको एक जैसी नज़र से मत देखिये। ” नूर ने कोशिश  की थी उसके नज़रिये को बदलने की।

कितना अजीब था ये द्वंद्व  भी।  कभी गावं तो कभी शहर , कभी विकास तो कभी परम्परा , कभी स्वावलम्बन तो कभी औरों पर  निर्भरता। क्या इन सब दोहरे प्रश्नों का किसी  जवाब था।  अखलाक़ सोच रहा था , काश कोई मुझे बता दे।  एक तरफ इस जगह से बरसों पुराना जुड़ाव है तो दूसरी और अपने बेटे को आगे बढ़ते देखने की तमन्ना।

नूर भी ऐसा ही कुछ सोच  रही थी। क्या जरुरी है ये गांव छोड़कर जाना आगे बढ़ने के लिए।  आखिर ऐसे आगे बढ़ने का क्या फायदा जिसमे सब कुछ पीछे छूट जाए। भला अपनों से दूर जाना भी क्या कोई विकास हुआ।  पर कहीं ऐसा तो नहीं की कल को तनवीर उसे ही जिम्मेदार ठहराए अपने भविष्य के लिए। ‘ अम्मी मेरा भविष्य और बेहतर होता अगर आपने हुज्हे नहीं रोक होता शहर जाने से पहले’, कहीं उसने ऐसा कहा तो। नूर भी परेशान थी।

पर आख़िरकार दोनों ने फैसला किया था उसे भेजने का।  पर साथ ही ये भी सोचा की उसे सिर्फ पढ़ने के लिए भेजेंगे और बाद में जब वो पढाई पूरी कर लेगा तो उसे वापस गावं ही बुला लेंगे।

उस बात को अब दस बरस हो गए थे।  इस सुकून की ज़िन्दगी को जैसे किसी की नज़र लग गयी थी। वक़्त बदला, तनवीर भी और गावं भी।  अब तनवीर की पढाई पूरी हो चुकी थी।  अखलाक़ ने उसे कहा था की वो अब गावं वापस आ जाये और गावं में ही उसका हाथ बंटाए या फिर शहर में कोई नौकरी कर ले पर शाम को गावं वापस आ जाए। नूर की भी तबियत ठीक नहीं रहती थी।

देश के साथ साथ  गावं का माहोल भी बदल गया था। अब पहले जैसा सौहार्द्रpeople-850971_640 नहीं था।  पहले सब को एक दूसरे की जरुरत होती थी कभी सामान तो कभी पैसे के लिए।  अब बैंकों ने वो जगह ले ली थी।  किसी भी ऐसी जरुरत के लिए अब पडोसी या दोस्त की जरुरत नहीं थी।  बैंक जो था सबका दोस्त उधार देने वाला , बस जमीन या घर ही तो गिरवी रखना था , या फिर गहने।
सब कहते थे देश बदल रहा है।  भारत अब चमक रहा था नयी नीतियों की बदौलत।  पर ये कैसा परिवर्तन था की अब न भाई की जरूररत थी न दोस्त की।  दोस्तों की जगह टेलीविजन और बातचीत की जगह मोबाइल फ़ोन ने ले ली थी।  अब अखलाक़ और रवि भाई काम ही मिलpeople-850971_640ते थे।   पर हाँ अब भी मिल लेते थे उसकी दुकान पर चाय के लिए।  नूर के पास तो अब कोई काम नहीं था।  सब तो बाजार से कढ़ाई वाले कपडे खरीदते थे , उसकी कढ़ाई अब कौन देखता।

तनवीर अपने अब्बु को मनाने में लगा था की अब पढाई पूरी होने के बाद भी वो शहर में ही बसना चाहता है , यहाँ गावं में नहीं।  उसे शहर गए हुए करीब एक दशक हो चला था।  ग्रेजुएशन के लिए गया था वो।  अब तो उसने डॉक्ट्रेट
भी कर ली थी।

“अब्बा आप नहीं जानते, शहरों की दुनिया कितनी आगे है।  अब भारत में भी वर्ल्ड क्लास शहर हैं जहाँ बहुत अच्छी सुविधाएँ हैं।  बेहतर सड़कें , चौबीस घंटे बिजली पानी  और सुरक्षा।  वहां पुलिस गावों की तरह नहीं होती की बुलाओ तो भी न आये या फिर हर छोटी सी शिकायत के लिए पैसे दो।  अच्छी शिक्षा है, अच्छे अस्पताल हैं। शहरों की दुनिया आधुनिक है अब्बा गावों की तरह पिछड़ी हुयी नहीं । “

अखलाक़ मियाँ लगातार तनवीर को समझने में लगे थे की वो गावं की किसी मुसलमान परिवार की लड़की से शादी कर ले और यहीं गावं में रहे।

अखलाक़ और नूर अपने बेटे की इतनी जरुरत कभी महसूस नहीं हुयी जितनी अब, इसीलिए दोनों चाहते थे की तनवीर वापस आ जाये।  पर अब तनवीर वापस नहीं आना चाहता था।  ‘अब्बा इतना पढ़ लिखने के बाद अगर मुझे इसी गन्दगी में रहना है तो क्यों मुझे  पढाया। मैं यहाँ नहीं रहना चाहता।  मुझे आगे बढ़ना है। आपसे मिलने मैं थोड़े दिनों में आ जाया करूँगा ‘, तनवीर ने बार बार यही बातें दोहराई थीं और इन्हीं सब ज़िद के बाद तनवीर चला गया।

अखलाक़ का छोटा सा परिवार जैसे तिनके सा बिखर गया था।  इस बिखराव में न कोई हिन्दू था न मुसलमान , न कोई ब्राह्मण था न कोई दूसरी ज़ात, न ही कोई किसान था या कोई जमींदार या मजदुर।  यहाँ तो सिर्फ माँ बाप की अपने औलाद से मोहब्बत थी जो आंधी में किसी पत्ते की तरह उड़ गयी थी।

सब लोग अखलाक़ को हौसला बंधा रहे थे।  पिछले तीन दिन से पड़ोसियों ने ही उसके यहाँ खाना बनाया।  अखलाक़ के यहाँ चूल्हा नहीं जला था।  पड़ोस की चुन्नी काकी और उनकी बेटी तीन दिन से यहीं थे नूर की देखभाल के लिए।  ‘घबरा मत अखलाक़ बेटा , हम सब हैं न।  ये ग़म  भी भूल ही जायेंगे।

तभी आँखों में आंसू भरे नूर अखलाक़ के पास आ बैठी।

“अखलाक़ मियां , आईये शहर चलते हैं , वहां अधिक तरक्क़ी है और पैसा भी।  प्यार, मुहब्बत और दोस्त सब वहां मिलता है , सुना है।  क्या पता मेरा तनवीर भी मिल जाए। “

दादरी, ग्रामीण समरसता और अन्य सवाल

क्या सवाल केवल दादरी का ही है? क्या मुद्दा सिर्फ क्या किसी ने खाया और कैसे किसी ने उसे अपनी सांस्कृतिक पहचान मानकर दंगा किया, ये है? या इन सवालों के कुछ और भी माने हैं। कैसी विडम्बना है की एक तरफ गावों में बसने वाला एक बड़ा भारतीय समाज ये शिकायत करता है की देश में गावों के साथ भेद भाव किया जाता है। विकास को लेकर बनायीं जाने वाली नीतियां हों या फिर अत्याधुनिक तकनीक का प्रयोग , इन सब का केंद्र शहर ही होते हैं, गावं नहीं। साथ ही साथ ये भी कहा जाता है की गावों में इस देश की आत्मा निवास करती है। ये आत्मा सांस्कृतिक भी है , आर्थिक भी, और राजनैतिक भी। अन्य शब्दों में गावों के साथ इन सब ऐतिहासिक विशेषताओं के बावजूद भेदभाव होता है। आखिर क्यों ?

देश का एक बड़ा पढ़ा लिखा , बुद्धिजीवी तबका इस बहस से वाक़िफ़ है की स्वतन्त्रता के बाद विकास और राजनीती का केंद्र क्या हों : गावं या शहर ? जहाँ एक और देश के वो नेता और बुद्धिजीवी थे (अम्बेडकर और नेहरू) भारत में सामाजिक और आर्थिक स्तर पर आमूल चूल परिवर्तन चाहते थे वहीँ दूसरी और ऐसे नेता भी थे जो भारत का विकास उसके सांस्कृतिक स्वरूप के साथ चाहते थे। उनके अनुसार गावं भारत की मिली जुली संस्कृति तथा स्वावलम्बी अर्थव्यवस्था का प्रतिक थे। हम सभी जानते हैं की इस दृष्टिकोण के पक्षधर गांधी जी थे। देश के एक बड़े तबके ने गांधी जी के अनेकों आंदोलनों में बड़ी संख्या में शिरकत कर ये तो बता ही दिया था की जान मानस गांधी जी के विचारों के काफी करीब था। यद्यपि अन्य नेता और बुद्धिजीवी गांधी जी से इत्तिफ़ाक़ नहीं रखते थे।

वर्तमान समय में विकास की धारा को दी जाने वाली चुनौती तथा जल, जंगल और ज़मीन के लिए होने वाले आंदोलन इस बात का प्रतिक हैं की ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी गावों को जीवन का आधार बनाये रखने तथा विकास की धरा को उनकी तरफ मोड़ने की कवायद निरंतर जारी है। ऐसे में दादरी या फिर मुजफ्फरनगर या फिर पलवल या फिर खाप पंचायत से चलने वाले गावं, जैसी घटनाएँ क्या हमें ये सोचने पर मजबूर नहीं करतीं की हम गावों में किस सांस्कृतिक समरसता की बात करते आये हैं ? क्या ये समरसता, मिली जुली संस्कृति सब एक छलावा है , ऐतिहासिक झूठ है ? क्या गावों में ऐसा कोई माहोल नहीं था जिसको लेकर गांधीवादी विचारधारा उन्हें विकास का केंद्र बनाना चाहती थी ? करीब एक दशक पहले तक कहा जाता था की भारत में धार्मिक दंगों की प्रकृति शहरी है ग्रामीण नहीं। गावों में धार्मिक उन्माद का वैसा नंगा नाच मिलता था जैसा शहरों में। पर अब धीरे धीरे स्थिति बदल रही है। शहरों में धार्मिक उन्माद के बाद लोग एक कोने से दूसरे कोने में चले जाते थे। पर गावों में ऐसे उन्माद के बाद केवल एक ही रास्ता बचता है , वो है पलायन। कारन साफ़ है , चूँकि बहुमत ने अपना पक्ष बता दिया है इसलिए अब वहां किसके भरोसे रहा जाये। पुलिस पर तो भरोसा किया नहीं जा सकता।

पलायन का यही विभ्त्स्व स्वरूप अब धीरे धीरे गावों प्रति उस सोच को सही साबित कर रहा है जिसक पक्षधर भारत के विकास के कर्णधार रहे हैं। अफसोसजनक की इन सब घटनाओं के बाद भी ग्रामीण परिवेश से , या ग्रामीण राजनितिक नेतृत्व से कोई पहल नहीं दिखाई पड़ती जो इन सब घटनाओं को रोकने के लिए हो। गावों के भीतर भी इन सब घटनाओं को मौन स्वीकृति जैसा माहोल रहता है या फिर ऐसी घटनाओं के कारणों को सही बताने कोशिश। ऐसे में धीरे धीरे गावं एक बड़े , खास तोर पर अल्पसंख्यक तबके के लिए , धीरे धीरे रहने लायक नहीं हैं। पलायन का एक मुख्या कारन ये भी है।

ऐसे पलायन को कुछ क्षेत्रों में रोकने के अधिक गंभीर प्रयास भी नहीं किये गए हैं। कारन साफ़ है, पलायन करती जनसँख्या शहरों में चल रहे कंस्ट्रक्शन वर्क , सिक्योरिटी एजेंसीज , सड़कों के किनारे लगते ढाबों , आफिस में मददगारों (पेओन), या घरों में काम करने के लिए हेल्प इत्यादि जरूरतें पूरी करता है। तो बहाल इसे सुनियोजित ढंग से रोकने की क्या आवश्यकता। अन्य शब्दों में , आर्थिक लॉजिक पलायन के पक्ष में है कारण चाहे जो हो।

दूसरी और गावों में रहने वाले लोगों ने भी धीरे धीरे शहरों की और देखना शुरू किया है अपनी समस्यायों के समाधान के लिए. आपसी सूझ बुझ आगे बढ़ने निर्धारित कोई वाद विवाद गावों में लुप्त प्राय है। ऐसे में शहर केंद्रित विकास की विचारधारा का धीरे धीरे फैलाव तथा गावों में बढ़ते सामाजिक तनाव जैसी घटनाएँ होनी लाज़मी हैं। आशा है दादरी के लोग इससे कुछ शुरुआत करें। सवाल सरकारों, पुलिस, और राजनितिक दलों का नहीं है। सवाल अपने अस्तित्व का है। क्या इस तरह की घटनाएँ गावों के अस्तित्व और अस्मिता को बनाएंगी समाप्त करेंगी ? सवाल ये है।

सवाल

अपने आप को ढूढता मैं,
किसी देश के किसी दूर कोने में,
किसी रेलवे स्टेशन, किसी बस स्टॉप,
किसी पार्क, किसी सड़क के कोने में,
अपनी निशानी ढूंढता हूं  मैं,
मैं हूं तो सही, जिंदा भी हूँ,
सांस भी बाकी है शायद उम्र भी,
मगर क्यों है,
इन सबका अर्थ ढूंढता हूं मैं,
अगर ये सब बेमानी हैं तो
क्यों इंतनी तवज्जो,
क्यों इतना हल्ला,
क्यों इतने माने हैं जीवन के,
समाज के, व्यक्ति के
बचपन के, जवानी के, वयस्कता के,
इन बेसिर पैर, बेमानी
उलजुलूल सवालों से उलझता
आखिर क्यों ही ये सवाल पूछता हूँ मैं.