अस्तित्व

खो गया हूँ मैं इन नयी भीड़ों में
अस्तित्व का तो प्रशन ही नहीं।

इंसानियत अब नहीं फ़ितरत
हमसफ़र अब इंसान नहीं।

सुख दुःख अब नहीं बंटते
ज़िन्दगी भर की यारियां अब रही नहीं।

रहीं हैं तो बस जीवन के ओब्जेक्टिवेस
कुछ गोल्स , कुछ जितने की ख्वाहिश।

हारना अब गंवारा नहीं किसी को ,
न ही गुमनाम रहना।

अब भीड़ है पर साथ नहीं
अकेलापन है पर हम आत्मसात नहीं।

अपने होने पर प्रशन है हर वक़्त ,
कौन उठाता है , ये पता नहीं।

देखते हैं हम औरों की और ,
काश कोई जवाब दे हमें।

जवाब ढूंढने की हिम्मत अब हम्मे रही नहीं
या फिर जवाब को स्वीकारने की क्षमता नहीं।

दौड़ते हैं हम इन नयी पक्की सड़कों पर
इनमे गड्ढे अब रहे नहीं।

या तो नशा दीखता है जीवन ,
या फिर रस्सी का छत से टंगा टुकड़ा।

ऐसे में कहाँ ढूढूं खुद को ,
अस्तित्व जब हमारा बचा ही नहीं।

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